व्यवहारवाद (Behavioralism) और उत्तर-व्यवहारवाद (Post-Behavioralism)

राजनीति विज्ञान के आधुनिक दृष्टिकोणों में व्यवहारवाद (Behavioralism) और उत्तर-व्यवहारवाद (Post-Behavioralism) दो अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद राजनीति विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक और प्रासंगिक बनाने के लिए ये आंदोलन उभरे।

यहाँ इन दोनों अवधारणाओं के विस्तृत नोट्स दिए गए हैं:


1. व्यवहारवाद (Behavioralism)

व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान के अध्ययन का वह दृष्टिकोण है जिसने पारंपरिक, संस्थागत और दार्शनिक अध्ययन के स्थान पर व्यक्ति के राजनीतिक व्यवहार पर ध्यान केंद्रित किया। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीति विज्ञान को एक ‘शुद्ध विज्ञान’ (Pure Science) बनाना था।

मुख्य विशेषताएँ (डेविड ईस्टन के अनुसार ‘बौद्धिक आधारशिलाएँ’)

डेविड ईस्टन ने व्यवहारवाद की 8 प्रमुख विशेषताएँ बताई हैं:

  1. नियमन (Regularities): राजनीतिक व्यवहार में कुछ सामान्य नियम खोजे जा सकते हैं जिनके आधार पर भविष्यवाणी संभव है।
  2. सत्यापन (Verification): एकत्रित किए गए तथ्यों का पुन: परीक्षण और सत्यापन किया जाना चाहिए।
  3. तकनीक (Techniques): शुद्ध शोध के लिए उन्नत सांख्यिकीय और गणितीय तकनीकों का प्रयोग।
  4. परिमाणीकरण (Quantification): तथ्यों और डेटा को मापने योग्य बनाना।
  5. मूल्य-निरपेक्षता (Value-free): शोधकर्ता को अपने व्यक्तिगत मूल्यों (Values) और आदर्शों को शोध से अलग रखना चाहिए। केवल ‘क्या है’ पर ध्यान दें, ‘क्या होना चाहिए’ पर नहीं।
  6. व्यवस्थाबद्धीकरण (Systematization): शोध क्रमबद्ध और सिद्धांत-उन्मुख होना चाहिए।
  7. शुद्ध विज्ञान (Pure Science): राजनीति विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञानों के समान सटीक बनाना।
  8. एकीकरण (Integration): राजनीति विज्ञान को अन्य सामाजिक विज्ञानों (जैसे मनोविज्ञान, समाजशास्त्र) के साथ जोड़ना।

आलोचना

  • यह केवल ‘तथ्यों’ पर जोर देता है, जिससे राजनीति की नैतिकता गायब हो जाती है।
  • यह अत्यधिक तकनीकी और खर्चीली पद्धति है।
  • मानवीय व्यवहार इतना परिवर्तनशील है कि उसका सटीक मापन असंभव है।

2. उत्तर-व्यवहारवाद (Post-Behavioralism)

1960 के दशक के अंत तक, स्वयं व्यवहारवाद के प्रणेता डेविड ईस्टन ने महसूस किया कि व्यवहारवाद समाज की वास्तविक समस्याओं को हल करने में विफल रहा है। इसी असंतोष से ‘उत्तर-व्यवहारवाद’ का जन्म हुआ।

इसे ‘कर्म और प्रासंगिकता’ (Action and Relevance) का आंदोलन कहा जाता है।

उत्तर-व्यवहारवाद के दो प्रमुख नारे

  1. प्रासंगिकता (Relevance): शोध का समाज की तत्कालीन समस्याओं (जैसे परमाणु युद्ध का भय, गृहयुद्ध, गरीबी) से सीधा संबंध होना चाहिए।
  2. कर्म (Action): ज्ञान का उद्देश्य केवल जानना नहीं, बल्कि समाज सुधार के लिए कार्य करना होना चाहिए।

मुख्य विशेषताएँ (Credo of Relevance)

  1. तकनीक से पूर्व सार (Substance before Technique): तकनीक महत्वपूर्ण है, लेकिन विषय-वस्तु (तथ्य और उद्देश्य) उससे अधिक महत्वपूर्ण है।
  2. सामाजिक परिवर्तन पर बल: व्यवहारवाद यथास्थितिवादी था, जबकि उत्तर-व्यवहारवाद सामाजिक परिवर्तन का समर्थन करता है।
  3. मूल्यों की भूमिका: उत्तर-व्यवहारवाद मानता है कि राजनीति विज्ञान में ‘मूल्यों’ (Values) को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
  4. बुद्धिजीवियों की भूमिका: वैज्ञानिकों को समाज की रक्षा और सुधार में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
  5. संकटोन्मुखी: यह दृष्टिकोण समाज के संकटों को सुलझाने पर ध्यान देता है।

व्यवहारवाद बनाम उत्तर-व्यवहारवाद: मुख्य अंतर

आधारव्यवहारवादउत्तर-व्यवहारवाद
मुख्य जोरतथ्य और तकनीक परप्रासंगिकता और कर्म पर
दृष्टिकोणमूल्य-निरपेक्ष (Value-free)मूल्य-सापेक्ष (Value-laden)
लक्ष्यराजनीति को विज्ञान बनानासमाज की समस्याओं को हल करना
प्रकृतियथास्थितिवादी (Conservative)परिवर्तनकारी (Reformist)

निष्कर्ष

जहाँ व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिक पद्धतियाँ और अनुशासन प्रदान किया, वहीं उत्तर-व्यवहारवाद ने उसे सामाजिक उत्तरदायित्व और प्रासंगिकता से जोड़ा। आज का राजनीति विज्ञान इन दोनों का एक संतुलित मिश्रण है।

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