राजस्थान की भूवैज्ञानिक संरचना अत्यंत विविध और जटिल है, जो इसे भारतीय शील्ड का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है। यहाँ की भूवैज्ञानिक संरचनाएँ आर्कियन (Archaean) तथा प्री-कैम्ब्रियन (Pre-Cambrian) युग से लेकर अभिनूतन (Recent) युग तक की शैल संरचनाओं को समाहित करती हैं।
प्रश्न 1: राजस्थान की भूवैज्ञानिक संरचना की प्रमुख विशेषताओं और इसके प्रमुख भूवैज्ञानिक कालक्रमों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
राजस्थान की भूवैज्ञानिक संरचना अपनी विशिष्टताओं के कारण भारत के अन्य राज्यों की तुलना में अद्वितीय है।
- प्राचीन शील्ड का हिस्सा: राजस्थान भारतीय शील्ड (Indian Shield) का एक महत्वपूर्ण खंड है, जिसमें विविध भूवैज्ञानिक और विवर्तनिक विशेषताएँ शामिल हैं। इसकी प्री-कैम्ब्रियन भूविज्ञान को आर्कियन तहखाना (Archaean basement – BGC) के बहु-चरणीय पुनर्संरचना (multistage reworking) द्वारा दर्शाया गया है।
- प्री-कैम्ब्रियन एवं प्रोटेरोजोइक संरचनाएँ: यहाँ आर्कियन तथा प्री-कैम्ब्रियन युग की संरचनाएँ साथ-साथ दिखाई देती हैं। अरावली तथा दिल्ली महासमूह (Aravalli and Delhi Supergroups) की मेसोप्रोटेरोजोइक (Mesoproterozoic) और निओप्रोटेरोजोइक (Neoproterozoic) वलन-क्षेप बेल्ट्स (fold-thrust belts) बार-बार विकसित हुई हैं।
- मालानी आग्नेय अनुक्रम (Malani Magmatic Suite – MIS): मालानी आग्नेय अनुक्रम भारतीय भूविज्ञान की एक अनूठी विशेषता है। मालानी श्रेणी की चट्टानें रायोलिटिक लावा समूह से बनी हैं जो अरावली शिस्ट (schist) पर टिकी हुई हैं। एरिनपुरा ग्रेनाइट (Erinpura granite), सिन्द्रेथ (Sindreth) और पूनगढ़ समूह (Punagarh Groups) की ज्वालामुखी चट्टानें निओप्रोटेरोजोइक (Neoproterozoic) मैग्मा गतिविधि का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- शैल समूह एवं महासंघ: कैम्ब्रियन-पूर्व कालक्रम में अरावली महासंघ और दिल्ली महासंघ आते हैं। प्राचीनतम चट्टानें बैंडेड नाइस कॉम्प्लेक्स (Banded Gneissic Complex) और बुंदेलखंड नाइस (Bundelkhand Gneiss) में सम्मिलित हैं।
- विवर्तनिक ध्रुवता: इस क्षेत्र में प्री-कैम्ब्रियन भूवैज्ञानिक और विवर्तनिक ध्रुवता (polarity) पश्चिम की ओर थी, जो फैनरोज़ोइक (Phanerozoic) काल में भी बनी रही। प्रोटीरोजोइक ओफिओलिटिक स्यूचर ज़ोन (ophiolitic suture zones) की पहचान की गई है, जैसे- अरावली स्यूचर (राखबदेव-झारोल) (लगभग $1.5 \text{ Ga}$) और दक्षिण दिल्ली स्यूचर (फूलाद) (लगभग $1.0 \text{ Ga}$)।
- खनिज संपदा: राजस्थान का भारत के खनिज परिदृश्य में एक विशेष स्थान है, क्योंकि इसमें सीसा (Lead), जस्ता (Zinc), और तांबा (Copper) के विश्व स्तरीय भंडार (जैसे आगुचा, जावर, दरीबा, खेतड़ी) और कई गैर-धात्विक खनिज भंडार मौजूद हैं।
- अवसादी बेसिन (Sedimentary Basins): प्रोटीरोजोइक विंध्यन (Vindhyan) और वाष्पीकृत मारवाड़ (Marwar) अनुक्रमों के समानांतर ही पश्चिमी राजस्थान में कटी-फटी मेसोजोइक और सेनोजोइक अनुक्रम (जैसे बाड़मेर, बीकानेर, नागौर और जैसलमेर बेसिन) विकसित हुए हैं।
प्रश्न 2: अरावली पर्वतमाला की भूवैज्ञानिक उत्पत्ति और महत्व पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अरावली पर्वतमाला पश्चिमी भारत में एक पर्वत श्रृंखला है जो दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, कुछ अनुमानों के अनुसार यह $2.5$ अरब साल से भी अधिक पुरानी है।
- उत्पत्ति और फैलाव: अरावली पर्वतमाला की उत्पत्ति गोंडवाना लैंड (Gondwanaland) के अवशेषों से हुई है। यह गुजरात के पालनपुर से लेकर उत्तर-पूर्व में दिल्ली तक लगभग 692 किलोमीटर तक फैली हुई है। राजस्थान में इसकी कुल लंबाई 550 किलोमीटर (लगभग $79.49 \%$) है।
- संरचना: अरावली महासमूह और दिल्ली महासमूह की कायांतरित चट्टानें प्रमुख हैं जो कैम्ब्रियन पूर्व काल की हैं। अजमेर और पश्चिमी मेवाड़ में दिल्ली महासमूह के शैल अरावली पर्वतमाला की सुंदर पहाड़ियों का निर्माण करते हैं।
- भौगोलिक भूमिका: अरावली पर्वतमाला राज्य को दो भागों में विभाजित करती है। यह रेगिस्तान के पूर्वी विस्तार को भी सीमाबद्ध करती है। यह पर्वत श्रृंखला गोंडवाना लैंड का हिस्सा है, जबकि पश्चिमी रेतीला प्रदेश टेथिस सागर का अवशेष है।
- आर्थिक महत्व: यह पर्वतमाला संगमरमर, ग्रेनाइट और अभ्रक जैसे खनिजों से समृद्ध है। अरावली क्षेत्र धात्विक खनिजों से भी समृद्ध है।