कक्षा 10वीं सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ इस पाठ में दो कविताएँ हैं — “उत्साह” और “अट नहीं रही है”। पहले हम कवि परिचय, फिर दोनों कविताओं की व्याख्या देखेंगे।
✦ कवि परिचय : सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
- जन्म : 1899 ई. में बंगाल के महिषादल में
- मूल निवास : गढ़ाकोला (जिला उन्नाव), उत्तर प्रदेश
- शिक्षा : नौवीं कक्षा तक औपचारिक पढ़ाई, फिर स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी सीखी
- विशेषता : संगीत और दर्शनशास्त्र के गहरे अध्येता, विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस से प्रभावित
- जीवन : बहुत संघर्षमय, परिवारजनों की असामयिक मृत्यु से गहरा दुख
- मृत्यु : 1961 ई. में
- प्रमुख कृतियाँ : अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता, नए पत्ते
- साहित्यिक योगदान : कविता, उपन्यास, कहानी, आलोचना, निबंध — सब क्षेत्रों में उत्कृष्ट रचनाएँ
- विशेषता :
- छायावाद के प्रमुख कवि
- मुक्त छंद का प्रयोग करने वाले पहले कवि
- शोषित और पीड़ितों के पक्षधर
- विद्रोही और क्रांतिकारी स्वभाव
✦ कविता 1 : उत्साह
- यह एक आह्वान गीत है।
- इसमें कवि बादल को संबोधित करता है।
- बादल यहाँ दुखी-प्यासे लोगों की प्यास बुझाने वाला भी है और क्रांति, नए अंकुर और नवजीवन जगाने वाला भी।
- कवि चाहता है कि बादल गरज कर धरती को शीतल करें, जैसे कविता भी समाज में नई ऊर्जा और परिवर्तन ला सकती है।
- कविता में दो बातें हैं :
- ललित कल्पना (सुंदर कल्पना की उड़ान)
- क्रांति चेतना (बदलाव और नवजीवन का संदेश)
👉 विद्यार्थियों के लिए समझ :
कवि बादल से कहता है – गरजो, बिजली के समान शक्ति भर दो, थकी हुई धरती को पानी से सींच दो और समाज में नया उत्साह जगाओ। यह कविता हमें कठिन परिस्थितियों में भी जोश और आशा बनाए रखने की प्रेरणा देती है।
✦ कविता 2 : अट नहीं रही है
- यह कविता फागुन ऋतु का सौंदर्य चित्रण करती है।
- कवि बताता है कि फागुन की मादकता (मस्ती, आकर्षण) इतनी गहरी है कि चारों ओर वही छाई हुई है।
- जब मन प्रसन्न होता है तो हर जगह फागुन का सौंदर्य दिखता है — हरी-लाल पत्तियों से लदी डालियाँ, फूलों की महक, उल्लास और आनंद।
- कवि ने सरल और सुंदर शब्दों से कविता को भी फागुन जैसा मादक और ललित बना दिया है।
👉 विद्यार्थियों के लिए समझ :
यह कविता हमें यह बताती है कि अगर मन प्रसन्न हो तो हमें चारों ओर सुंदरता ही दिखाई देती है। फागुन ऋतु की तरह जीवन भी रंगों और उल्लास से भर जाता है।
✦ मुख्य बातें याद रखने योग्य
- निराला छायावाद के विद्रोही कवि थे।
- उन्होंने मुक्त छंद की परंपरा शुरू की।
- उनकी कविताओं में समाज के पीड़ित वर्ग के प्रति सहानुभूति और शोषक वर्ग के खिलाफ प्रतिकार दिखाई देता है।
- “उत्साह” में — बादल क्रांति और नवजीवन का प्रतीक है।
- “अट नहीं रही है” में — फागुन का सौंदर्य और उल्लास झलकता है।
✦ कविता 1 : उत्साह
मूल पंक्ति :
“बादल, गरजो! घेर-घेर घोर गगन, धाराधर ओ!
ललित-ललित, बाल कल्पना, काले घुँघराले, के-से पाले,
विद्युत-छवि उर में, कवि, नवजीवन वाले!
वज्र छिपा, नूतन कविता फिर भर दो–
बादल, गरजो!”
व्याख्या :
कवि बादल को संबोधित करके कहता है –
हे बादल! तुम आकाश को घेर कर जोर से गरजो।
तुम्हारी काली-घुँघराली लटों जैसी छवि सुंदर लगती है।
तुम्हारे भीतर बिजली की चमक है, उसी तरह कवि के हृदय में भी नवजीवन जगाने की शक्ति है।
तुम अपने भीतर छिपी हुई बिजली (शक्ति) से नई कविता को भर दो।
अर्थात् – जैसे बादल धरती को जीवनदायी जल देता है, वैसे ही कविता समाज को नई ऊर्जा और चेतना दे।
मूल पंक्ति :
“विकल-विकल, उन्मन थे उन्मन
विश्व के निदाघ के सकल जन,
आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन।
तप्त धरा जल से फिर शीतल कर दो–
बादल, गरजो!”
व्याख्या :
सारी दुनिया गर्मी से दुखी होकर बेचैन थी।
लोग व्याकुल और थके हुए थे।
अचानक अनंत आकाश से बादल उमड़ आए।
हे बादल! गरज कर धरती को वर्षा से ठंडक दो।
अर्थात् – जैसे बादल गर्मी से पीड़ित लोगों को राहत देता है, वैसे ही कविता समाज में आशा और नवजीवन भर देती है।
👉 निष्कर्ष :
इस कविता में कवि ने बादल को नवजीवन और क्रांति का प्रतीक माना है।
कविता हमें उत्साह, संघर्ष और परिवर्तन का संदेश देती है।
✦ कविता 2 : अट नहीं रही है
मूल पंक्ति :
“अट नहीं रही है आभा फागुन की, तन सट नहीं रही है।
कहीं साँस लेते हो, घर-घर भर देते हो।
उड़ने को नभ में तुम जर-पर कर देते,
आँख हटाता हूँ तो हट नहीं रही है।”
व्याख्या :
कवि कहता है –
फागुन की छवि इतनी अद्भुत और मनमोहक है कि हटाए नहीं हटती।
वसंत की हवा हर घर को जीवन से भर देती है।
हवा के झोंके जैसे उड़ते हुए आकाश को भी छू लेते हैं।
कवि आँखें फेरना चाहता है, लेकिन फागुन का सौंदर्य हटता ही नहीं।
मूल पंक्ति :
“पत्तों से लदी डाल कहीं हरी, कहीं लाल, कहीं पड़ी है
उर में मद-गंध-पुष्प-माल,
पाट-पाट शोभा श्री पट नहीं रही है।”
व्याख्या :
फागुन में डालियाँ हरे और लाल पत्तों से लदी रहती हैं।
फूलों की मदमस्त सुगंध वातावरण में फैल जाती है।
धरती मानो सुंदर पट (वस्त्र) पहनकर सजी हुई है।
यह सौंदर्य और शोभा आँखों से हटाई नहीं जा सकती।
✦ कविता 1 : उत्साह
पंक्ति :
“बादल, गरजो! घेर-घेर घोर गगन, धाराधर ओ!
ललित-ललित, बाल कल्पना, काले घुँघराले, के-से पाले,
विद्युत-छवि उर में, कवि, नवजीवन वाले!
वज्र छिपा, नूतन कविता फिर भर दो–
बादल, गरजो!”
शब्दार्थ :
- गरजो = जोर से आवाज़ निकालो
- घेर-घेर = चारों ओर फैलकर
- घोर गगन = घना आकाश
- धाराधर = पानी की धार छोड़ने वाला
- ललित = सुंदर, मनोहर
- बाल कल्पना = मासूम कल्पना
- विद्युत-छवि = बिजली की चमक
- वज्र = शक्तिशाली अस्त्र (यहाँ शक्ति का प्रतीक)
- नूतन = नया
व्याख्या :
कवि बादल से कहता है –
हे बादल! तुम आकाश को घेर कर जोर-जोर से गरजो।
तुम्हारा रूप बड़ा मनोहर लगता है – जैसे बालकों की कल्पना, काले-घुँघराले बाल।
तुम्हारे हृदय में बिजली जैसी चमक और ऊर्जा है।
हे बादल! अपनी छिपी हुई शक्ति को प्रकट करो और नई कविता को शक्ति से भर दो।
👉 यहाँ बादल = क्रांति और नवजीवन का प्रतीक है।
पंक्ति :
“विकल-विकल, उन्मन थे उन्मन
विश्व के निदाघ के सकल जन,
आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन।
तप्त धरा जल से फिर शीतल कर दो–
बादल, गरजो!”
शब्दार्थ :
- विकल = बेचैन
- उन्मन = उदास, मन न लगना
- निदाघ = भीषण गर्मी
- सकल जन = सारे लोग
- अनंत = असीम
- तप्त धरा = गर्म धरती
- शीतल = ठंडी
व्याख्या :
भीषण गर्मी से धरती पर सभी लोग बेचैन और उदास हो गए थे।
तभी अनंत आकाश से घने बादल आ गए।
हे बादल! अब तुम गरजकर वर्षा करो और तप्त धरती को शीतल कर दो।
👉 यह संकेत है कि जैसे बादल गर्मी से राहत देते हैं, वैसे ही कविता समाज की पीड़ा को कम करके उसमें नई आशा और शक्ति भरती है।
✦ “उत्साह” का सार :
- बादल = शक्ति, क्रांति और नवजीवन का प्रतीक।
- कविता = समाज में नई चेतना और बदलाव का साधन।
- यह कविता हमें संघर्षों के बीच भी उत्साह बनाए रखने की प्रेरणा देती है।
✦ कविता 2 : अट नहीं रही है
पंक्ति :
“अट नहीं रही है आभा फागुन की, तन सट नहीं रही है।
कहीं साँस लेते हो, घर-घर भर देते हो।
उड़ने को नभ में तुम जर-पर कर देते,
आँख हटाता हूँ तो हट नहीं रही है।”
शब्दार्थ :
- अट नहीं रही है = हट नहीं रही है
- आभा = चमक, सुंदरता
- फागुन = वसंत का महीना (फाल्गुन मास)
- जर-पर = चारों ओर
- नभ = आकाश
व्याख्या :
कवि कहता है कि फागुन ऋतु की सुंदरता और मादकता मन से हटाई नहीं जाती।
वसंत की बयार घर-घर में जीवन और उल्लास भर देती है।
हवा के झोंके उड़कर आकाश को भी आंदोलित कर देते हैं।
कवि आँखें फेरता है, लेकिन फागुन की छवि मन से हटती ही नहीं।
👉 यहाँ कवि दिखाना चाहता है कि जब मन प्रसन्न होता है तो हर जगह सौंदर्य ही सौंदर्य दिखता है।
पंक्ति :
“पत्तों से लदी डाल कहीं हरी, कहीं लाल, कहीं पड़ी है
उर में मद-गंध-पुष्प-माल,
पाट-पाट शोभा श्री पट नहीं रही है।”
शब्दार्थ :
- डाल = पेड़ की शाखा
- मद-गंध = मादक सुगंध
- पुष्प-माल = फूलों की माला
- पाट-पाट = जगह-जगह
- श्री पट = सजावटी वस्त्र
व्याख्या :
फागुन में पेड़ों की डालियाँ हरे-लाल पत्तों से लदी रहती हैं।
फूलों की सुगंध वातावरण में फैल जाती है और मन को मादक बना देती है।
धरती मानो सुंदर रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर सजी हुई है।
यह सौंदर्य हर ओर इतना फैला है कि हटाए नहीं हटता।
✦ “अट नहीं रही है” का सार :
- यह कविता फागुन ऋतु की सुंदरता और आनंद का चित्रण है।
- कवि ने वातावरण की रंग-बिरंगी छवि और मादकता को शब्दों में उतारा है।
- संदेश यह है कि जब मन प्रसन्न हो तो संसार हमें आनंदमय और सुंदर दिखने लगता है।
✦ निष्कर्ष (दोनों कविताओं से)
- निराला ने प्रकृति को मानवीय रूप देकर गहरे भाव व्यक्त किए हैं।
- “उत्साह” में बादल = संघर्ष, नवजीवन, क्रांति।
- “अट नहीं रही है” में फागुन = सुंदरता, उल्लास और आनंद।
- इन कविताओं से हमें सकारात्मक सोच, उत्साह और जीवन की सुंदरता देखने की प्रेरणा मिलती है।