कक्षा 11 राजनीति विज्ञान – अध्याय 1: संविधान: क्यों और कैसे?

कक्षा 11 राजनीति विज्ञान – अध्याय 1: संविधान: क्यों और कैसे?

1. परिचय एवं संविधान की बुनियादी अवधारणा

संविधान किसी भी राज्य का वह मूलभूत ढाँचा और सर्वोच्च कानून होता है जिसके आधार पर सरकार का निर्माण होता है, उसकी शक्तियाँ तय होती हैं और शासन का संचालन किया जाता है। सरकार की विभिन्न संस्थाओं (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) के गठन, उनके आपसी संबंधों और नागरिकों के साथ उनके संबंधों का मूल स्रोत संविधान ही है।

2. संविधान की आवश्यकता और इसके मुख्य कार्य

समाज में व्यवस्था, न्याय और सामंजस्य बनाए रखने के लिए संविधान अत्यंत आवश्यक है। संविधान के प्रमुख कार्यों को निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है:

कार्य 1: बुनियादी नियमों का समूह उपलब्ध कराना (तालमेल और भरोसा)

  • विविधता में समन्वय: समाज में विभिन्न धर्मों (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि), व्यवसायों, योग्यताओं, संपत्तियों और आयु वर्ग के लोग एक साथ रहते हैं। उनके बीच विभिन्न मुद्दों (जैसे- संपत्ति, शिक्षा, सुरक्षा, संसाधन) पर विचार भिन्न हो सकते हैं।
  • न्यूनतम सामंजस्य: संविधान बुनियादी नियमों का एक ऐसा समूह उपलब्ध कराता है, जिससे समाज के सदस्यों में एक न्यूनतम समन्वय और विश्वास बना रहे।
  • कानूनी बाध्यता: इन नियमों का केवल ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इन्हें न्यायालय द्वारा लागू (Enforceable) किया जाता है। जब नागरिकों को यह विश्वास होता है कि अन्य लोग भी इन नियमों का पालन करेंगे (और न करने पर दंडित होंगे), तो समाज में सुरक्षा और स्थायित्व आता है।

कार्य 2: निर्णय-निर्माण शक्ति की विशिष्टताएँ तय करना

  • सत्ता का निर्धारण: संविधान यह स्पष्ट करता है कि समाज में कानून बनाने और निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होगी।
  • विभिन्न शासन प्रणालियाँ:
    • राजतंत्र: निर्णय लेने की शक्ति राजा के पास होती है।
    • एक-दलीय व्यवस्था (उदा. पुराना सोवियत संघ): निर्णय का अधिकार केवल एक पार्टी को होता है।
    • लोकतांत्रिक संविधान: निर्णय लेने की शक्ति मोटे तौर पर जनता या उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के पास होती है।
  • भारतीय संदर्भ: भारतीय संविधान में यह स्पष्ट किया गया है कि अधिकतर कानून संसद बनाएगी और संसद का गठन एक विशेष प्रक्रिया द्वारा किया जाएगा।

कार्य 3: सरकार की शक्तियों पर सीमाएँ लगाना

  • अनुचित कानूनों पर रोक: यदि सरकार कोई ऐसा नियम बना दे जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करता हो (जैसे- किसी खास धर्म या रंग के कपड़ों पर प्रतिबंध, मनमानी गिरफ्तारी, संपत्ति का अधिकार छीनना), तो ऐसा कानून अन्यायी होता है।
  • मौलिक अधिकार (Limits on Government Power): संविधान सरकार की शक्तियों को सीमित करने के लिए नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जिनका उल्लंघन सरकार कभी नहीं कर सकती।
  • प्रमुख स्वतंत्रताएँ: भाषण की स्वतंत्रता, अंतरात्मा की आवाज पर काम करने की स्वतंत्रता, और संगठन बनाने की स्वतंत्रता।
  • अपवाद: राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) के समय इन अधिकारों को सीमित या वापस लिया जा सकता है, जिसकी शर्तें भी संविधान में ही उल्लेखित होती हैं।

कार्य 4: समाज की आकांक्षाओं और लक्ष्यों को पूरा करना

  • सकारात्मक भूमिका: आधुनिक संविधान (विशेषकर 20वीं शताब्दी के) केवल सरकार की शक्ति पर प्रतिबंध ही नहीं लगाते, बल्कि सरकार को ऐसे समर्थ ढाँचे प्रदान करते हैं जिससे वह समाज की आकांक्षाओं और लक्ष्यों को पूरा कर सके।
  • न्यायपूर्ण समाज का निर्माण: असमानता, गरीबी और जातिगत/नस्लीय भेदभाव वाले समाजों में सरकार को लोक-कल्याणकारी कदम उठाने के लिए सक्षम बनाना आवश्यक होता है।
  • संवैधानिक समर्थन: भारतीय संविधान में सरकार को दी गई यह सामर्थ्य संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में देखने को मिलती है।

3. राष्ट्र की बुनियादी पहचान (Fundamental Identity of a Nation)

संविधान किसी समाज की सामूहिक और बुनियादी पहचान का निर्माण करता है:

  1. राजनीतिक पहचान: संविधान के बुनियादी नियमों और सिद्धांतों पर सहमत होकर नागरिक अपनी मूलभूत ‘राजनीतिक पहचान’ बनाते हैं कि उन पर शासन कैसे होगा और शासितों के अधिकार क्या होंगे।
  2. नैतिक पहचान: संविधान यह तय करता है कि कोई व्यक्ति क्या कर सकता है और क्या नहीं, जिससे एक आधिकृत नैतिक सीमा और ‘नैतिक पहचान’ बनती है।
  3. राष्ट्रीय पहचान के विभिन्न आधार:
    • जर्मनी: जर्मनी का निर्माण ‘जर्मन नस्ल’ की पहचान के आधार पर हुआ और उसके संविधान ने इस पहचान को अभिव्यक्त किया।
    • भारत: भारतीय संविधान नागरिकता के आधार के रूप में किसी विशिष्ट जातियता, नस्ल या धर्म को मान्यता नहीं देता।

4. संविधान की सत्ता एवं प्रभावकारिता के कारक

कोई संविधान कितना प्रभावी है और लोग उसका आदर क्यों करते हैं, यह निम्नलिखित तीन मुख्य कारकों पर निर्भर करता है:

                  संविधान की प्रभावकारिता के कारक
                                 │
     ┌───────────────────────────┼───────────────────────────┐
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प्रचलन में लाने का तरीका     मौलिक प्रावधान             संतुलित संस्थागत रूपरेखा
(Mode of Promulgation)    (Substantive Provisions)  (Balanced Institutional Design)

1. संविधान को प्रचलन में लाने का तरीका (Mode of Promulgation)

  • सफल राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि: विश्व के सर्वाधिक सफल संविधान—भारत, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका—ऐसे संविधान हैं जो एक सफल राष्ट्रीय आंदोलन के बाद बनाए गए।
  • जन-विश्वास और वैधता: भारतीय संविधान को औपचारिक रूप से एक संविधान सभा ने दिसंबर 1946 से नवंबर 1949 के मध्य बनाया। इसे बनाने वाले ऐसे नेता थे जिन पर जनता का अूट विश्वास था और जिनमें समाज के सभी वर्गों से सीधा संवाद करने की क्षमता थी।
  • विफलता का कारण: जिन देशों में संविधान सैनिक शासकों या अलोकप्रिय नेताओं द्वारा बनाए जाते हैं, वहाँ वे प्रभावहीन हो जाते हैं।

2. संविधान के मौलिक प्रावधान (Substantive Provisions)

  • प्रत्येक वर्ग को आदर का कारण: एक सफल संविधान समाज के हर वर्ग (अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक) को यह महसूस कराता है कि यह उनके अधिकारों की रक्षा करता है।
  • यदि बहुसंख्यक वर्ग को अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की अनुमति दी जाए या किसी छोटे समूह की शक्ति को ही मजबूत किया जाए, तो जनता की निष्ठा समाप्त हो जाती है।

3. संस्थाओं की संतुलित रूपरेखा (Balanced Institutional Design)

  • शक्तियों का क्षैतिज बंटवारा: संविधान किसी एक संस्था को एकाधिकार स्थापित नहीं करने देता। भारतीय संविधान ने शक्तियों को विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा स्वतंत्र संवैधानिक निकायों (जैसे निर्वाचन आयोग) के बीच संतुलित रूप से बाँटा है।
  • अवरोध और संतुलन (Checks and Balances): यदि कोई एक संस्था संविधान का अतिक्रमण करना चाहे, तो अन्य संस्थाएँ उस पर नियंत्रण कर लेती हैं।
  • कठोरता और लचीलेपन का संतुलन:
    • अत्यधिक कठोर संविधान परिवर्तन के दबाव में नष्ट हो जाते हैं।
    • अत्यधिक लचीला संविधान समाज को सुरक्षा और स्थायी पहचान नहीं दे पाता।
    • भारतीय संविधान एक ‘जीवंत दस्तावेज’ (Living Document) है, जो अपने मूलभूत मूल्यों की रक्षा करते हुए बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता रखता है।

5. भारतीय संविधान का निर्माण एवं संविधान सभा

भारतीय संविधान का निर्माण औपचारिक रूप से एक संविधान सभा द्वारा किया गया था।

गठन की प्रक्रिया एवं तिथियाँ

  • प्रथम बैठक: 9 दिसंबर 1946 (अविभाजित भारत में)।
  • पुनः बैठक: 14 अगस्त 1947 को विभाजित भारत की संविधान सभा के रूप में।
  • सदस्यों का चयन: संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव 1935 में स्थापित प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष विधि से किया गया था।

कैबिनेट मिशन योजना (Cabinet Mission Plan)

संविधान सभा की रचना ब्रिटिश मंत्रिमंडल की एक समिति—‘कैबिनेट मिशन’ द्वारा प्रस्तावित योजना के अनुसार हुई:

  1. जनसंख्या के अनुपात में सीटें: प्रत्येक प्रांत, देशी रियासत या रियासतों के समूह को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आवंटित की गईं।
  2. सीटों का अनुपात: मोटे तौर पर प्रति 10 लाख (दस लाख) की जनसंख्या पर 1 सीट का अनुपात रखा गया।

6. अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण एवं तुलनात्मक अध्ययन (केस स्टडीज)

संविधान निर्माण की जटिलताओं को समझने के लिए पाठ्यपुस्तक में दिए गए अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण:

देश / संगठनसंवैधानिक स्थिति एवं चुनौतियाँ
नेपाल• 1948, 1951, 1959, 1962 और 1990 में संविधान बने, लेकिन ये सभी ‘नेपाल-नरेश’ द्वारा प्रदान किए गए।<br>• बहु-दलीय लोकतंत्र के बावजूद अंतिम शक्तियाँ राजा के पास रहीं।<br>• अक्टूबर 2002 में राजा ने समस्त शक्तियाँ हाथ में ले लीं। तत्पश्चात गणतांत्रिक सरकार व संविधान निर्माण हेतु हिंसक व राजनीतिक आंदोलन हुए।
इराक• सद्दाम हुसैन की सत्ता समाप्त होने के बाद नए संविधान निर्माण के दौरान शिया, सुन्नी और कुर्द जैसे विभिन्न जातीय/धार्मिक समूहों में भारी संघर्ष देखा गया।
दक्षिण अफ्रीका• नस्लीय भेदभाव के लंबे इतिहास को समाप्त करने के लिए नए संविधान ने सरकार को सक्षम बनाया।<br>• सरकार को पर्यावरण संरक्षण, अन्यायपूर्ण भेदभाव से बचाव, आवास और स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने का दायित्व सौंपा।
इंडोनेशिया• संविधान द्वारा सरकार को राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था बनाने, उसका संचालन करने तथा गरीब व अनाथ बच्चों की देखभाल करने की जिम्मेदारी दी गई।
यूरोपीय संघ (EU)• यूरोपीय संघ के देशों ने एक साझा यूरोपीय संविधान बनाने का प्रयास किया, परंतु उनका यह प्रयास विफल रहा।

7. परीक्षा उपयोगी त्वरित पुनरावृत्ति (प्रावधान एवं उनके कार्य)

संवैधानिक प्रावधान / बिंदुसंविधान का कार्य / भूमिका
सरकार द्वारा किसी धर्म की अनिवार्यता न थोपनासरकार की शक्तियों पर सीमा लगाना (नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा)।
आय व संपत्ति की असमानता कम करने का प्रयाससमाज की आकांक्षाओं और लक्ष्यों को पूरा करना (सकारात्मक कल्याणकारी कदम)।
राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की नियुक्तिसरकार के गठन और निर्णय लेने की शक्ति का निर्धारण।
संविधान सर्वोच्च कानून होनासंस्थाओं की कार्यप्रणाली में स्थायित्व और नियमों की कानूनी बाध्यता।
नस्ल, जाति या धर्म के आधार पर नागरिकता में भेदभाव न होनासमाज की न्यायपूर्ण राजनीतिक पहचान की स्थापना।
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