राजनीति और अर्थव्यवस्था 750-1000 ई.

राजनीति और अर्थव्यवस्था 750-1000 ई.

राजनीति और अर्थव्यवस्था (750-1000 ई.)

I. राजनीतिक स्थिति (750-1000 ई.)

750 ई. से 1200 ई. के बीच की अवधि को पूर्व मध्यकाल कहा जाता है। इस दौरान, भारतीय उपमहाद्वीप कई क्षेत्रीय राज्यों में विभाजित हो गया था, जो लगातार आपस में संघर्षरत रहते थे।

1. प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियाँ और त्रिपक्षीय संघर्ष

750-1000 ई. के दौरान तीन प्रमुख राजनीतिक शक्तियाँ उभरीं जो उत्तर भारत पर नियंत्रण के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं: उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहार, पूर्वी भारत में पाल और दक्कन में राष्ट्रकूट।

क. कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष

  • यह दौर (लगभग 750 से 950 ई.) त्रिपक्षीय संघर्ष के लिए जाना जाता है।
  • इस संघर्ष का मुख्य उद्देश्य उत्तरी भारत पर साम्राज्यवादी वर्चस्व स्थापित करना और तत्कालीन शाही शहर कन्नौज पर कब्ज़ा करना था।
  • गुर्जर-प्रतिहारों ने अंततः 9वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में कन्नौज और उत्तरी भारत पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया।

ख. गुर्जर-प्रतिहार

  • गुर्जर-प्रतिहार उत्तरी भारत की एक प्रमुख शक्ति थे।
  • नागभट्ट प्रथम (लगभग 730-756 ई.) ने प्रतिहार राज्य का विस्तार किया और अरबों को सिंध से आगे बढ़ने से सफलतापूर्वक रोका
  • वत्सराज (लगभग 778-805 ई.) ने राजस्थान के मध्य भाग और उत्तर भारत के पूर्वी भाग को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।
  • नागभट्ट द्वितीय (लगभग 805-833 ई.) ने प्रतिहार वंश की शक्ति और प्रतिष्ठा को बढ़ाया।
  • मिहिर भोज (लगभग 836-885 ई.) ने आंध्र, सैंधव, विदर्भ और कलिंग के शासकों को पराजित किया था। उन्होंने आर्त (उत्तरी गुजरात), मालवा, किरात, तुर्क (तुर्कों), वत्स और मत्स्य के राजाओं के पहाड़ी किलों पर विजय प्राप्त की थी।

ग. पाल वंश

  • पाल साम्राज्य की स्थापना गोपाल ने लगभग 750 ई. में की थी। गोपाल को बंगाल की राजनीतिक उथल-पुथल को समाप्त करने के लिए सामंतों द्वारा शासक चुना गया था।
  • पाल वंश ने वर्तमान बंगाल और बिहार के कुछ हिस्सों पर शासन किया।
  • पाल शासक महायान बौद्ध धर्म के प्रबल समर्थक थे।
  • धर्मपाल (लगभग 770-810 ई.) ने अपने सैन्य अभियानों के माध्यम से बंगाल, कन्नौज, मध्य प्रदेश और संभवतः नेपाल तक अपनी शक्ति का विस्तार किया।
  • ध्रुवपाल के संयुक्त शासन (लगभग 780-890 ई.) का काल पाल शासन का सबसे समृद्ध और महान काल माना जाता है।
  • प्रशासन राजतंत्रात्मक था। राजा सभी शक्तियों का केंद्र होता था और परमेश्वर, परमभट्टारक, महाराजाधिराज जैसे शाही उपाधियाँ धारण करता था।

घ. राष्ट्रकूट

  • राष्ट्रकूट वंश ने 8वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक भारत के बड़े हिस्सों पर शासन किया।
  • राष्ट्रकूट वंश की स्थापना दक्कन में दंतिदुर्ग ने की थी।
  • राष्ट्रकूट राजा संप्रभु थे और परमेश्वर तथा महाराजाधिराज जैसी उपाधियाँ धारण करते थे।
  • राष्ट्रकूट राजाओं ने अरबों के साथ मित्रता बनाए रखकर अरब व्यापार को बढ़ावा दिया।
  • राष्ट्रकूट प्रशासन व्यवस्था गुर्जर-प्रतिहारों के मुकाबले अधिक विस्तृत थी।

2. बाह्य प्रभाव

  • अरबों ने 712 ई. में सिंध पर विजय प्राप्त की। हालांकि, गुर्जर-प्रतिहारों ने पश्चिम से होने वाले विदेशी आक्रमणों का सफलतापूर्वक विरोध किया।
  • महमूद गजनवी के आक्रमण 10वीं शताब्दी के अंत (994-1040) के आसपास शुरू हुए, हालांकि इस पर विस्तृत जानकारी 1000 ई. के बाद की है।

II. अर्थव्यवस्था (750-1000 ई.)

750 ई. से 1000 ई. की अवधि में भारत के आर्थिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया, जिसमें व्यापार में गिरावट और कृषि अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक निर्भरता प्रमुख थी।

1. भारतीय सामंतवाद का उदय

  • इस युग में सामंती व्यवस्था का उदय हुआ।
  • सामंतवाद के उदय का सबसे महत्वपूर्ण कारण भूमि अनुदान की प्रथा का बढ़ना था, जिसके तहत शासकों, पुजारियों, मंदिरों और योद्धा सरदारों को भूमि अनुदान दिया जाता था।
  • भूमि अनुदानों ने एक पदानुक्रमित भूस्वामी वर्ग (hierarchical landowning class) के विकास को जन्म दिया।
  • भूमि अनुदानों के परिणामस्वरूप, किसानों के भूमि अधिकार कम हो गए, मजबूर श्रम (विष्टि/सर्व-पीड़ा) का प्रचलन बढ़ा, और किसानों का आर्थिक शोषण हुआ।

2. कृषि अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भर गाँव

  • प्रतिहार साम्राज्य की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित थी। सरकार के राजस्व का मुख्य स्रोत कृषि उत्पादन से प्राप्त कर था।
  • इस काल की एक प्रमुख विशेषता कृषि विस्तार थी। यह विस्तार ब्रह्मदेय और अग्रहार (ब्राह्मणों को दिए गए अनुदान) की स्थापना से शुरू हुआ।
  • सामंतवादी मॉडल के समर्थकों का तर्क है कि व्यापार में गिरावट और धातु मुद्रा की कमी के कारण मुख्य रूप से आत्मनिर्भर और अलग-थलग ग्रामीण अर्थव्यवस्था का उदय हुआ।

3. व्यापार, वाणिज्य और मौद्रिक स्थिति

700 ई. से 900 ई. के चरण को व्यापार में सापेक्ष गिरावट के रूप में चिह्नित किया गया है, जिसके बाद 900 ई. से 1300 ई. के चरण में पुनरुत्थान देखा गया।

क. व्यापार में गिरावट (750-1000 ई.)

  • इस अवधि में लंबी दूरी के व्यापार में गिरावट आई। 600-1000 ई. के बीच रोमन साम्राज्य के साथ भारत के मजबूत व्यापार में गिरावट का वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
  • राजनीतिक विखंडन और आंतरिक व्यापार में गिरावट के कारण गाँव की अर्थव्यवस्था बंद और आत्मनिर्भर हो गई।
  • हालांकि, राजाओं और सामंती प्रमुखों के उपयोग के लिए कीमती और विलासिता वाली वस्तुओं (जैसे हाथी दांत, घोड़े, कीमती पत्थर) में व्यापार जारी रहा। नमक और तेल प्रमुख व्यापारिक वस्तुएं थीं।
  • व्यापारी गिल्ड (Guilds) मौजूद थे और वे स्थानीय प्राधिकरणों के असहयोगी होने पर व्यापार को विनियमित करते थे और कीमतों और व्यापार क्षेत्र को तय करते थे।

ख. मौद्रिक संकट (Monetary Anaemia)

  • 750-1000 ई. के दौरान धातु मुद्रा (सिक्कों) की कमी एक महत्वपूर्ण विशेषता थी।
  • स्रोतों के अनुसार, सिक्कों की कमी ने व्यापार के संकुचन के सिद्धांत को बल दिया। इस काल में चांदी (silver) का उपयोग दुर्लभ था।
  • पाल वंश के कुछ अभिलेखों में द्रम्म (drammas) का उल्लेख है, हालांकि ये सिक्के संख्या में कम थे और कौड़ी (cowrie) का उपयोग विनिमय के माध्यम के रूप में अधिक प्रचलित था।
  • दक्षिण भारत में भी 8वीं शताब्दी के मध्य से 10वीं शताब्दी के अंत तक धातु के सिक्कों की सापेक्ष कमी थी।

4. दक्षिण भारत का आर्थिक पहलू (संदर्भ 750-1000 ई.)

  • चोल साम्राज्य में वाणिज्य और व्यापार सड़क मार्गों और व्यापारी संघों (गिल्डों) के माध्यम से सक्रिय थे।
  • राष्ट्रकूटों के पास कोई निश्चित वंशीय सिक्का नहीं था, लेकिन अरबी द्रम्मों (Arabic drammas) का उपयोग हो सकता था।
  • राष्ट्रकूट राजाओं ने अरबों के साथ मित्रता बनाए रखकर समुद्री व्यापार को बढ़ावा दिया।
  • कृषि की समृद्धि के कारण सिल्क-बुनाई उद्योग (कांची में) और धातु का काम खूब फला-फूला।

निष्कर्ष के रूप में एक रूपक

750-1000 ई. की भारतीय अर्थव्यवस्था को एक विशाल कृषि-आधारित नदी के रूप में देखा जा सकता है। राजनीतिक संघर्षों (त्रिपक्षीय संघर्ष) और बाहरी व्यापार में आई कमी के कारण यह नदी सिकुड़ गई थी। भूमि अनुदानों (सामंतवाद) ने इस नदी को कई छोटी, स्थानीय धाराओं में विभाजित कर दिया, जिससे केंद्रीय प्रवाह (व्यापार और मुद्रा) कमजोर पड़ गया, और आत्मनिर्भर गाँव ही अर्थव्यवस्था के मुख्य जलाशय बन गए।

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