गुप्तोत्तर काल: पल्लव, चालुक्य और वर्धन राजवंशों का राज्य
I. गुप्तोत्तर काल: परिचय और राजनीतिक विखंडन (Introduction and Political Fragmentation)
गुप्तोत्तर काल (Post-Gupta Period) उस अवधि को संदर्भित करता है जो स्कंदगुप्त की मृत्यु के बाद लगभग छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य से शुरू हुई थी। इस काल को उत्तरी भारत में राजनीतिक अव्यवस्था और विखंडन की अवधि के रूप में चिह्नित किया गया।
A. गुप्त साम्राज्य का पतन और नए राज्यों का उदय
- विखंडन: स्कंदगुप्त (माना जाता है कि साम्राज्य को अक्षुण्ण रखने वाले अंतिम शक्तिशाली राजा) के बाद गुप्त साम्राज्य का विघटन और विखंडन शुरू हो गया। साम्राज्य की कमजोर केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था (lack of centralized administration) इसके पतन का एक कारण थी।
- क्षेत्रीय शक्तियों का उदय: गुप्तों के बाद क्षेत्रीय साम्राज्यों का उदय हुआ। उत्तर भारत में प्रमुख शक्तियाँ थीं:
- मौखरी (कन्नौज)।
- पुष्यभूति (थानेश्वर/वर्धन वंश)।
- उत्तर गुप्त (मगध)।
- मैत्रक (वल्लभी)।
- दक्षिण की प्रमुखता: उत्तर में विखंडन के विपरीत, दक्षिण भारत में चालुक्यों (दक्कन) और पल्लवों (सुदूर दक्षिण) जैसे दो महान साम्राज्यों के उदय के साथ प्रमुखता बढ़ी।
B. सामंतीकरण की प्रकृति (Nature of Feudalisation)
- विकेंद्रीकरण: गुप्त प्रशासन पहले से ही मौर्यों के केंद्रीकृत मॉडल से अलग, अधिक विकेंद्रीकृत और अर्ध-सामंती (more decentralize and quasi-feudal) था।
- सामंतों की भूमिका: गुप्तों के अधीन सामंत (Feudatories) और करद राज्य (vassal states) थे। सामंतों को राजस्व अनुदान के माध्यम से प्रशासनिक और न्यायिक अधिकार दिए जाते थे। सामंतों की बढ़ती शक्ति ने केंद्रीय सत्ता को सीमित कर दिया।
- सामंत चक्र (Samantachakra): सामंत (Samanta) नामक संस्था गुप्तोत्तर काल की मुख्य नवाचार थी। राजा अपनी प्रसिद्धि बढ़ाने के लिए सामंतों और महासामंतों की बड़ी संख्या में उपस्थिति को महत्व देते थे।
II. वर्धन/पुष्यभूति राजवंश (Harshavardhana and His Times)
A. स्रोत और प्रारंभिक इतिहास (Sources and Early History)
- स्रोत: हर्ष और उनके काल के इतिहास के मुख्य स्रोतों में बाणभट्ट (उनके दरबारी कवि) द्वारा रचित हर्षचरित और चीनी यात्री ह्वेन त्सांग (Si-Yu-Ki) का यात्रा वृत्तांत शामिल है। मधुबन प्लेट अभिलेख वर्धन वंश की वंशावली का स्पष्ट विवरण देता है।
- उत्पत्ति: पुष्यभूति वंश स्थाण्वीश्वर (थानेसर, हरियाणा में) में शासन करता था। प्रभाकरवर्धन एक प्रसिद्ध शासक थे, जिनके पुत्र थे राज्यवर्धन और हर्षवर्धन।
- राज्यारोहण (606 ईस्वी): राज्यवर्धन की शशांक द्वारा धोखे से हत्या किए जाने के बाद, हर्षवर्धन ने 606 ईस्वी में थानेश्वर का सिंहासन संभाला। बाद में उन्होंने कन्नौज (Kanyakubja) को अपनी राजधानी बनाया।
B. हर्ष की उपलब्धियाँ और सैन्य संघर्ष
- सैन्य अभियान: हर्ष ने शशांक (गौड़ के राजा) के विरुद्ध अभियान चलाया और अपने बहनोई (मौखरी राजा) के हत्यारे देवगुप्त (मालवा) के विरुद्ध भी सैन्य कार्रवाई की।
- वल्लभी विजय: हर्ष ने वल्लभी के ध्रुवसेन-द्वितीय को पराजित किया, जिसने बाद में उनकी अधीनता स्वीकार कर ली।
- पुलकेशिन द्वितीय से संघर्ष: हर्ष की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य हार चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के हाथों नर्मदा नदी के तट पर हुई थी। इस हार ने हर्ष की दक्षिण विजय की महत्वाकांक्षा पर रोक लगा दी। अभिलेखों में पुलकेशिन द्वितीय को ‘सकलत्तरापथनाथ’ (संपूर्ण उत्तर क्षेत्र के स्वामी) के रूप में वर्णित करके हर्ष को पराजित करने का उल्लेख है।
C. प्रशासन, समाज और पतन
- प्रशासन: हर्ष का प्रशासन गुप्तों के समान था, लेकिन यह अधिक सामंती और विकेन्द्रीकृत था। हर्ष ने व्यक्तिगत रूप से राज्य के मामलों में सक्रिय रुचि ली और निरीक्षण के लिए अक्सर अपने राज्य का दौरा किया।
- राजस्व और अर्थव्यवस्था: ह्वेन त्सांग के अनुसार, राज्य के राजस्व को चार भागों में विभाजित किया गया था: राजा के व्यक्तिगत खर्च, विद्वानों को पुरस्कार, सरकारी अधिकारियों के वेतन, और धार्मिक उद्देश्यों के लिए। अधिकारियों को वेतन के रूप में भूमि अनुदान देने की सामंती प्रथा हर्ष के काल में शुरू हुई। हर्ष के शासनकाल में व्यापार और वाणिज्य में गिरावट आई, जिसके कारण स्वयं-पर्याप्त ग्रामीण अर्थव्यवस्था (self-sufficient village economy) का उदय हुआ।
- साहित्य और संस्कृति: हर्ष ने स्वयं नागानंद, प्रियदर्शिका और रत्नावली नामक तीन नाटक लिखे। उनके दरबारी कवि बाणभट्ट ने हर्षचरित और कादम्बरी की रचना की। हर्ष ने नालंदा विश्वविद्यालय को भी संरक्षण दिया।
- पतन: हर्ष की मृत्यु 647 ईस्वी में बिना किसी स्पष्ट उत्तराधिकारी के हो गई, और उनका साम्राज्य तेजी से छोटे राज्यों में विघटित हो गया।
III. बादामी के चालुक्य (Chalukyas of Badami)
चालुक्य दक्कन में छठी शताब्दी ईस्वी में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरे, जो सातवाहनों और वाकाटकों के उत्तराधिकारी थे।
A. स्थापना और प्रमुख शासक
- संस्थापक: पुलकेशिन प्रथम (लगभग 540 ईस्वी) को राजवंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है, जिसने वातापी (बादामी) में एक छोटा राज्य स्थापित किया और महाराजा की उपाधि धारण की। उन्होंने अपनी प्रमुख स्थिति स्थापित करने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया।
- शासकों की उपाधियाँ: चालुक्य शासकों ने ‘श्रीपृथिवीवल्लभ’ की उपाधि धारण की, जिसका अर्थ है श्री लक्ष्मी और पृथ्वी के पति।
- पुलकेशिन द्वितीय (608–642 ईस्वी): वह इस वंश का सबसे महत्वपूर्ण शासक था।
- स्रोत: उसके शासनकाल का विवरण ऐहोल अभिलेख से मिलता है, जिसे उनके जैन दरबारी कवि रविकीर्ति ने संस्कृत में रचा था।
- विजय: उन्होंने कदंबों, मैसूर के गंगों पर विजय प्राप्त की और नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन को पराजित किया।
- पल्लवों से प्रतिद्वंद्विता: पुलकेशिन द्वितीय और पल्लव राजा महेंद्रवर्मन प्रथम के बीच संघर्ष शुरू हुआ। पुलकेशिन ने कांची तक पल्लवों को धकेल कर उनसे विजय प्राप्त की।
- पराजय: पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम ने वातापी पर हमला किया, पुलकेशिन द्वितीय को मार डाला और राजधानी को नष्ट कर दिया। नरसिंहवर्मन प्रथम ने ‘वातापीकोंडा’ की उपाधि धारण की।
- पतन: दंतिदुर्ग, जो राष्ट्रकूट राजवंश का संस्थापक था, ने अंतिम चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन द्वितीय को पराजित किया, जिससे चालुक्यों की शक्ति का अंत हुआ।
B. प्रशासन और सांस्कृतिक योगदान
- प्रशासन: चालुक्य प्रशासन अत्यधिक केंद्रीकृत था, और पल्लवों या चोलों के विपरीत इसमें ग्राम स्वायत्तता अनुपस्थित थी। पुलकेशिन द्वितीय ने साम्राज्य को सामंतों और विश्वसनीय परिवार के सदस्यों (जैसे उनके भाई विष्णुवर्धन, जो वेंगी के राज्यपाल बने) द्वारा शासित प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित किया।
- धर्म: बादामी के चालुक्य ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे, लेकिन अन्य धर्मों का भी सम्मान करते थे। जैन धर्म इस क्षेत्र में प्रगति के पथ पर था। ह्वेन त्सांग ने पश्चिमी दक्कन में बौद्ध धर्म के पतन का उल्लेख किया।
- कला और स्थापत्य:
- चालुक्यों ने वेसर शैली में संरचनात्मक मंदिरों का विकास किया, जो बादामी, ऐहोल और पट्टडकल में मौजूद हैं।
- उनके गुफा मंदिर अजंता, एलोरा और नासिक में पाए जाते हैं। अजंता की गुफाओं में पुलकेशिन द्वितीय द्वारा फारसी दूतावास के स्वागत को दर्शाया गया है।
IV. पल्लव राजवंश (Pallava Dynasty of Kanchi)
पल्लवों ने तीसरी शताब्दी ईस्वी से लेकर 9वीं शताब्दी ईस्वी तक दक्षिणी भारत पर शासन किया।
A. उत्पत्ति और राजनीतिक इतिहास
- उत्पत्ति: पल्लव शुरू में सातवाहनों के सामंत थे। एक मत के अनुसार, वे टोंडैमंडलाम् (Tondaimandalam) के मूल निवासी थे, जो सबसे अधिक स्वीकार्य है। कांचीपुरम उनकी राजधानी थी।
- प्रारंभिक शासक: प्रारंभिक पल्लव शासक प्राकृत और संस्कृत में चार्टर जारी करते थे। शिवस्कंदवर्मन ने अश्वमेध यज्ञ किया और धर्म-महाराजा की उपाधि धारण की।
- सिंहविष्णु (575 ईस्वी): उन्हें कलभ्रों (Kalabhras) का विनाशक माना जाता है। उनके शासनकाल में पल्लव शक्ति कावेरी नदी तक फैली।
- महेन्द्रवर्मन प्रथम (600–630 ईस्वी):
- चालुक्य संघर्ष: उनके शासनकाल में चालुक्य-पल्लव संघर्ष शुरू हुआ, जब पुलकेशिन द्वितीय ने उनके राज्य के उत्तरी भाग पर कब्ज़ा कर लिया।
- कला और साहित्य: वह एक महान निर्माता थे (चित्रकारपुली – Chitrakarapuli) और उन्होंने चट्टान काटकर बनाए गए मंदिरों (rock-cut temples) की शुरुआत की।
- उन्होंने संस्कृत नाटक मत्तविलास प्रहसनम् की रचना की।
- नरसिंहवर्मन प्रथम (630–668 ईस्वी):
- विजय: उन्होंने पुलकेशिन द्वितीय को हराकर वातापी पर कब्ज़ा किया और ‘वातापीकोंडा’ की उपाधि धारण की।
- वास्तुकला: महाबलीपुरम के एकल पत्थर के रथ (monolithic rathas) उनके शासनकाल के दौरान बनाए गए।
- ह्वेन त्सांग: चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने उनके शासनकाल में कांचीपुरम का दौरा किया और उल्लेख किया कि कांची में 100 बौद्ध मठ थे।
- राजसिम्हा (नरसिंहवर्मन द्वितीय) (695–722 ईस्वी): उनका शासनकाल शांतिपूर्ण था। उन्होंने शोर मंदिर (Mamallapuram) और कैलाशनाथ मंदिर (Kanchipuram) जैसे संरचनात्मक मंदिरों (structural temples) की शुरुआत की। उनके दरबार में संस्कृत विद्वान दण्डी थे।
- पतन: चोल राजा आदित्य प्रथम ने अंतिम पल्लव शासक अपराजित को हराकर 9वीं शताब्दी के अंत में पल्लव शासन का अंत किया।
B. प्रशासन और सांस्कृतिक योगदान
- प्रशासनिक प्रभाग: पल्लव राज्य कोट्टमों (Kottams) में विभाजित था, जिसका प्रशासन राजा द्वारा नियुक्त अधिकारियों द्वारा किया जाता था। विशाल साम्राज्य को मंडलम्, कोट्टम, नाडु और उर (गाँव) जैसे प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था।
- राजस्व: भू-राजस्व आय का प्राथमिक स्रोत था। ब्रह्मदेय (ब्राह्मणों को) और देवदान (मंदिरों को) भूमि कर मुक्त थी।
- समुद्री शक्ति: पल्लवों ने एक नौसेना विकसित की, जिसके महाबलीपुरम और नागापट्टनम में डॉकयार्ड थे।
- धर्म और भक्ति आंदोलन: पल्लव काल में शैव धर्म और वैष्णव धर्म का उदय हुआ। शैव नयनमारों और वैष्णव अलवारों ने तमिल भाषा में भक्ति गीत रचे, जिससे भक्ति आंदोलन का विकास हुआ।
- शिक्षा: उनकी राजधानी कांची शिक्षा का एक प्राचीन केंद्र थी, जहाँ घाटिका (Ghatika) दूर-दूर के छात्रों को आकर्षित करती थी।
- स्थापत्य: पल्लवों ने द्रविड़ शैली की मंदिर वास्तुकला की शुरुआत की, जो चट्टान काटकर बनाए गए मंदिरों से शुरू हुई, एकल पत्थर के रथों तक विकसित हुई और संरचनात्मक मंदिरों में परिणत हुई।
V. गुप्तोत्तर काल के आर्थिक और प्रशासनिक परिवर्तन
गुप्तोत्तर काल (Post-Gupta Period) को सामंतवाद के उदय और व्यापार में गिरावट से चिह्नित परिवर्तन का काल माना जाता है।
A. विकेंद्रीकरण और सामंतवाद की वृद्धि
- सामंतों की शक्ति: सामंत (Feudal Lords) शक्तिशाली व्यक्ति बन गए, जो राजा के लिए सैन्य सेवा करते थे और उन्हें अपनी हार के बाद वफादारी दिखानी पड़ती थी (जैसा कि पल्लवों के सामंत बनस, चालुक्यों के विरुद्ध पुलकेशिन द्वितीय के अभियान में विरोध करते थे)।
- प्रशासनिक मॉडल: गुप्त प्रशासनिक मॉडल, जिसमें विकेंद्रीकरण पर जोर दिया गया था, बाद में बादामी के चालुक्यों और राष्ट्रकूटों ने भी अपनाया।
- राजस्व की प्रकृति: गुप्तोत्तर काल में कई प्रशासनिक पद वंशानुगत हो गए, और अधिकारियों को नकद के बजाय भूमि अनुदान के माध्यम से भुगतान किया जाता था।
B. आर्थिक ह्रास और व्यापारिक गिरावट
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में गिरावट: तीसरी शताब्दी ईस्वी के बाद रोमन साम्राज्य के साथ दीर्घकालिक व्यापार में गिरावट आई। छठी शताब्दी के अंत तक पश्चिमी रोमन साम्राज्य के साथ बाहरी व्यापार लगभग समाप्त हो गया, जिससे शहरी अर्थव्यवस्था का पतन हुआ।
- सिक्का-ढलाई का ह्रास: इस अवधि में सोने के सिक्के दुर्लभ हो गए थे। सिक्कों की कलात्मक गुणवत्ता भी गिर गई, और उन्हें सरल राजवंशीय मुद्राओं द्वारा चिह्नित किया गया। इसका एक अपवाद त्रिपुरी के कलचुरि शासक गंगेयदेव थे, जिन्होंने ‘बैठी हुई लक्ष्मी के सिक्के’ जारी करके सोने के सिक्कों का पुनरुद्धार किया।
- भूमि अनुदान का प्रभाव: भूमि अनुदान (Land grants) की बढ़ती प्रथा ने किसानों को राजस्व स्रोत और प्रशासनिक अधिकारों के साथ धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष प्राप्तकर्ताओं को हस्तांतरित कर दिया। इससे स्थानीय, स्वयं-पर्याप्त ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हुई।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था: हर्ष के काल में व्यापार में गिरावट और हस्तशिल्प उद्योग के प्रभावित होने के कारण स्वयं-पर्याप्त ग्रामीण अर्थव्यवस्था का उदय हुआ।