भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका (Role of Agriculture in the Indian Economy)

भारतीय अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था है, और आर्थिक विकास की रणनीति में कृषि क्षेत्र को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है।

1. राष्ट्रीय आय में योगदान (Contribution to National Income):

  • ऐतिहासिक रूप से, कृषि क्षेत्र का भारतीय सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product – GDP) में बहुत बड़ा योगदान रहा है।
  • 1950-51 में, शुद्ध घरेलू उत्पाद (Net Domestic Product – NDP) में प्राथमिक क्षेत्र (जिसमें कृषि और संबद्ध गतिविधियां शामिल हैं) का हिस्सा 55.3 प्रतिशत था।
  • यद्यपि समय के साथ यह योगदान कम होता गया है, फिर भी कृषि क्षेत्र अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा है।
  • 1995-96 तक, प्राथमिक क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान घटकर 28.5 प्रतिशत रह गया था, जबकि यह 1970-71 में 44.7 प्रतिशत और 1980-81 में 39.7 प्रतिशत था।

2. रोज़गार का स्रोत (Source of Employment):

  • भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Rural Economy) में कृषि क्षेत्र में अदृश्य बेरोजगारी (Disguised unemployment) या प्रच्छन्न बेरोजगारी की समस्या बहुत गंभीर है।
  • अनुमान है कि भारत में कृषि में 15 से 30 प्रतिशत कृषि श्रम शक्ति (agricultural labour force) अदृश्य बेरोजगारी या अल्परोजगार (underemployment) से पीड़ित है।
  • हालांकि, कृषि और ग्रामीण विकास पर केंद्रित योजनाओं के माध्यम से बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन की संभावना मौजूद है। कृषि विकास योजनाओं से सालाना 500 से 600 लाख अतिरिक्त लोगों के लिए रोजगार क्षमता (Employment potential) उत्पन्न होने का अनुमान था।

3. पूँजी निर्माण में भूमिका (Role in Capital Formation):

  • प्रोफेसर नर्क्से (Professor Nurkse) के अनुसार, अविकसित देशों में गरीबी के दुष्चक्र को तोड़ने के लिए, कृषि क्षेत्र में छिपी हुई अतिरिक्त श्रम शक्ति (surplus labour) का उपयोग पूँजी निर्माण के लिए किया जा सकता है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में जो ‘अनुत्पादक आश्रित’ (unproductive dependents) हैं, वे उपभोग करते हैं लेकिन उत्पादन में योगदान नहीं करते। उनकी उपभोग शक्ति को पूंजी निर्माण के लिए उपयोग किया जा सकता है।

4. आर्थिक नियोजन में महत्व (Importance in Economic Planning):

  • भारत के आर्थिक नियोजन (Economic Planning) की शुरुआती रणनीतियों में कृषि को एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखा गया था।
  • प्रथम पंचवर्षीय योजना (1950-51 से 1955-56) में कुल परिव्यय (Outlay) का 31 प्रतिशत कृषि और सिंचाई पर खर्च किया गया था। इस योजना का उद्देश्य आर्थिक विकास के लिए कृषि अधिशेष (Agricultural surpluses) प्राप्त करना था।
  • द्वितीय पंचवर्षीय योजना ने उद्योग (विशेषकर भारी उद्योगों) पर अधिक ध्यान केंद्रित किया, जिससे कृषि क्षेत्र को आवंटित परिव्यय का प्रतिशत घटकर 20 प्रतिशत हो गया।
  • सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) का उद्देश्य ‘खाद्य, काम और उत्पादकता’ (Food, Work, and Productivity) था, और इसमें कृषि उत्पादन में 4.0 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर का लक्ष्य रखा गया था।

5. कृषि की मुख्य विशेषताएँ और चुनौतियाँ (Key Characteristics and Challenges):

  • भारतीय कृषि अक्सर निम्न उत्पादकता (Low productivity) की विशेषता रखती है।
  • नियोजन के तहत, भू-सुधार (Land Reforms) को आर्थिक विकास में तेजी लाने के लिए एक आवश्यक पूर्व-आवश्यकता के रूप में माना गया है।
  • कृषि विकास की स्थिरता और वृद्धि के लिए हरित क्रांति की प्रौद्योगिकी और शुष्क खेती (Dry farming) के विकास पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक माना गया है।

संक्षेप में, भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका राष्ट्रीय आय और रोजगार के एक प्रमुख स्रोत के रूप में रही है, और यह आर्थिक नियोजन तथा पूँजी निर्माण की रणनीतियों का एक अभिन्न अंग है।

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