भारत की जलवायु और मानसून (Climate and Monsoon of India): विस्तृत नोट्स
1. मौसम, जलवायु और भारतीय जलवायु की प्रकृति (Weather, Climate & Nature of Indian Climate)
भारतीय मानसून को समझने से पहले मौसम और जलवायु के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है:
(क) मौसम और जलवायु में अंतर
- मौसम (Weather): किसी स्थान विशेष की अल्पकालिक (दैनिक, साप्ताहिक या तात्कालिक) वायुमंडलीय दशाओं (जैसे तापमान, वायुदाब, पवन, आर्द्रता और वर्षण) के योग को ‘मौसम’ कहते हैं। मौसम दिन में कई बार बदल सकता है (जैसे सुबह धूप और दोपहर में अचानक वर्षा)।
- जलवायु (Climate): किसी बड़े क्षेत्र में लंबी समयावधि (सामान्यतः 30 वर्ष से अधिक) के दौरान मौसम की विविधताओं, अवस्थाओं और उनके औसत पैटर्न के कुल योग को ‘जलवायु’ कहा जाता है। जलवायु एक स्थाई या दीर्घकालिक संकल्पना है।
(ख) भारतीय जलवायु की विशिष्ट प्रकृति
- उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु (Tropical Monsoon Climate): भारत की जलवायु को मूलतः ‘उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु’ कहा जाता है।
- भौगोलिक विरोधाभास और एकता: यद्यपि कर्क रेखा (23°30′ उ.) भारत के मध्य से गुजरती है, जिससे इसका उत्तरी भाग उपोष्ण कटिबंध (Sub-tropical Zone) में और दक्षिणी भाग उष्ण कटिबंध (Tropical Zone) में आता है। इसके बावजूद, संपूर्ण भारत की जलवायु में उष्णकटिबंधीय विशेषताएं पाई जाती हैं।
- हिमालय का जलवायु अवरोध: इसका मुख्य कारण उत्तर में स्थित गगनचुम्बी हिमालय पर्वतमाला है। हिमालय मध्य एशिया से आने वाली अत्यंत ठंडी और बर्फीली ध्रुवीय पवनों को रोककर भारत की रक्षा करता है। इसके कारण पूरे उत्तर भारत में शीतकाल में भी तापमान अपेक्षाकृत ऊंचा बना रहता है। इस प्रकार, हिमालय पूरे देश को एक विशिष्ट जलवायुविक एकता प्रदान करता है।
2. भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक (Factors Influencing Indian Climate)
भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया जाता है:
(क) स्थिति और उच्चावच संबंधी कारक (Location & Relief Factors)
- अक्षांश (Latitude): दक्षिण भारत भूमध्य रेखा के निकट होने के कारण वर्षभर उच्च तापमान और कम वार्षिक तापांतर का अनुभव करता है, जबकि कर्क रेखा के उत्तर में स्थित भाग में विषम और महाद्वीपीय जलवायु पाई जाती है।
- हिमालय पर्वत (The Himalayas): यह मध्य एशिया की ठंडी हवाओं से रक्षा करने के साथ-साथ दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनों के मार्ग में अवरोध उत्पन्न कर भारत में प्रचुर वर्षा कराता है।
- जल और स्थल का वितरण (Distribution of Land & Water): भारत के दक्षिण में तीन ओर हिंद महासागर, अरब सागर व बंगाल की खाड़ी स्थित हैं, जबकि उत्तर में विशाल स्थलीय भाग है। थल और जल के गर्म व ठंडे होने की भिन्न दरों (विभेदी तापन) के कारण मानसूनी पवनों का विकास होता है।
- समुद्र तट से दूरी (Distance from Sea): तटीय क्षेत्रों (जैसे मुंबई, चेन्नई) में समकारी जलवायु पाई जाती है, जबकि आंतरिक भागों (जैसे दिल्ली, अमृतसर) में विषम जलवायु (अत्यधिक गर्म ग्रीष्मकाल और अत्यधिक ठंडी शीतकाल) पाई जाती है।
- समुद्र तल से ऊंचाई (Altitude): ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है। इसी कारण एक ही अक्षांश पर स्थित होने के बावजूद मैदानी भाग के आगरा (16°C) और पर्वतीय क्षेत्र के दार्जिलिंग (4°C) के जनवरी के तापमान में भारी अंतर पाया जाता है।
- उच्चावच और पर्वतीय अवरोध (Relief): पश्चिमी घाट के पवन अभिमुख ढाल (Windward Slope) पर 250 सेमी से अधिक वर्षा होती है, जबकि उसका पूर्वी ढाल वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow region) होने के कारण बहुत कम वर्षा प्राप्त करता है।
(ख) वायुदाब और पवन संबंधी कारक (Air Pressure & Wind Factors)
- धरातलीय वायुदाब व पवनें: ऋतुओं के अनुसार वायुदाब पेटियों का विस्थापन होता है। ग्रीष्म ऋतु में उत्तरी मैदान पर तापीय न्यून वायुदाब (Low Pressure) का विकास होता है जो आर्द्र समुद्री पवनों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
- जेट स्ट्रीम (Jet Streams): क्षोभमंडल के ऊपरी भाग में अत्यधिक तीव्र गति से बहने वाली इन पवनों की भारतीय मानसून में महत्वपूर्ण भूमिका है। शीतकाल में उपोष्ण पछुआ जेट स्ट्रीम हिमालय के दक्षिण में बहती है, जबकि ग्रीष्मकाल में यह उत्तर की ओर खिसक जाती है।
- पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances): शीत ऋतु में भूमध्य सागर से उत्पन्न होकर पछुआ जेट के सहारे भारत में प्रवेश करने वाले शीतोष्ण चक्रवातों को पश्चिमी विक्षोभ कहते हैं। इनसे उत्तर-पश्चिम भारत और राजस्थान में होने वाली हल्की शीतकालीन वर्षा को स्थानीय भाषा में ‘मावठ’ (Mavath) कहा जाता है। यह वर्षा रबी की फसल (विशेषकर गेहूँ) के लिए ‘अमृत’ के समान होती है।
3. भारतीय मानसून की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत (Theories of Monsoon Origin)
मानसून की उत्पत्ति अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। इसे समझाने के लिए भूगोलवेत्ताओं ने समय-समय पर विभिन्न सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है:
(क) तापीय सिद्धांत (Thermal Theory)
- प्रतिपादक: सर एडमंड हैली (1686)।
- मूल विचार: यह सिद्धांत जल और स्थल के विपरीत तापन (Differential Heating) पर आधारित है। ग्रीष्मकाल में उत्तर-पश्चिम भारत का विशाल भूभाग अत्यधिक गर्म हो जाता है, जिससे वहां तीव्र न्यून वायुदाब (LP) का केंद्र बनता है, जबकि हिंद महासागर पर उच्च वायुदाब (HP) होता है। इस वायुदाब प्रवणता के कारण हवाएं समुद्र से स्थल की ओर (दक्षिण-पश्चिम मानसून) चलने लगती हैं।
- सीमा: यह सिद्धांत मानसून के अचानक आने (प्रस्फोट) और इसकी ऊपरी वायुमंडलीय गतिविधियों को समझाने में असमर्थ है।
(二) गत्यात्मक सिद्धांत (Dynamic Theory)
- प्रतिपादक: एच. फ्लोन (1951)।
- मूल विचार: मानसून की उत्पत्ति केवल तापीय कारणों से नहीं, बल्कि सूर्य के उत्तरायण व दक्षिणायन के कारण वायुदाब और पवन पेटियों के विस्थापन का परिणाम है।
- ITCZ का महत्व: ग्रीष्मकाल में सूर्य के उत्तरायण होने पर अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) उत्तर की ओर खिसककर गंगा के मैदान (20°-25° उ. अक्षांश) पर स्थापित हो जाता है, जिसे ‘मानसून गर्त’ (Monsoon Trough) कहते हैं। यह गर्त दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों को भूमध्य रेखा पार करने के लिए आकर्षित करता है, जो कोरिओलिस बल और फेरेल के नियम के कारण दाईं ओर मुड़कर भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के रूप में प्रवेश करती हैं।
(ग) जेट स्ट्रीम सिद्धांत (Jet Stream Theory)
- प्रतिपादक: यीन और पी. कोटेश्वरम।
- मूल विचार: यह मानसून की उत्पत्ति को ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण से जोड़ता है।
- कार्यप्रणाली: ग्रीष्मकाल में सूर्य के उत्तरायण होने पर उपोष्ण पछुआ जेट स्ट्रीम हिमालय के उत्तर में विस्थापित हो जाती है। इसी समय, तिब्बत का पठार अत्यधिक गर्म हो जाता है, जिससे वहाँ से उठने वाली गर्म हवाएं क्षोभमंडल के ऊपरी भाग में दक्षिण की ओर मुड़कर ‘उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम’ (पूर्वा जेट) का निर्माण करती हैं। यह पूर्वी जेट हिंद महासागर में मस्करीन हाई के पास नीचे बैठती है, जिससे धरातलीय दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनों को अत्यधिक गति प्राप्त होती है और भारत में अचानक तीव्र वर्षा शुरू हो जाती है, जिसे ‘मानसून का प्रस्फोट’ (Burst of Monsoon) कहते हैं।
(घ) अल-नीनो और ला-नीना का प्रभाव (El Niño & La Niña)
- अल-नीनो (El Niño): यह प्रशांत महासागर में पेरू के तट के निकट उत्पन्न होने वाली एक गर्म महासागरीय जलधारा है। यह हिंद महासागर के वायुदाब तंत्र को कमजोर कर देती है, जिससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है और भारत में सूखा (Drought) या कम वर्षा की स्थिति बनती है।
- ला-नीना (La Niña): यह अल-नीनो के विपरीत प्रशांत महासागर का ठंडा चरण है। यह भारतीय मानसून को अत्यधिक सुदृढ़ और तीव्र बनाता है, जिससे भारत में प्रचुर और भारी वर्षा होती है।
4. भारत की जलवायुविक ऋतुएं (Seasons of India)
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, भारत के वार्षिक ऋतु चक्र को मुख्य रूप से 4 ऋतुओं में विभाजित किया जाता है:
१. शीत ऋतु (Cold Weather Season) – मध्य नवंबर से फरवरी
- इस ऋतु में सूर्य दक्षिणायन होता है, जिससे उत्तर भारत में तापमान तेजी से गिरता है (जनवरी-फरवरी सबसे ठंडे महीने होते हैं)।
- उत्तर भारत में औसतन तापमान 10°C से 15°C के बीच रहता है, जबकि दक्षिण भारत में समकारी प्रभाव के कारण यह लगभग 20°C से 25°C बना रहता है।
- इस दौरान हवाएं स्थल से समुद्र की ओर (उत्तर-पूर्वी मानसूनी पवनें) चलती हैं, जिससे अधिकांश देश शुष्क रहता है।
- अपवाद (शीतकालीन वर्षा):
- भूमध्य सागर से आने वाले पश्चिमी विक्षोभों से उत्तर-पश्चिम भारत (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान) में ‘मावठ’ की वर्षा होती है।
- उत्तर-पूर्वी पवनें बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर तमिलनाडु के कोरोमंडल तट पर मूसलाधार शरदकालीन वर्षा कराती हैं।
२. ग्रीष्म ऋतु (Hot Weather Season) – मार्च से मई
- सूर्य के उत्तरायण होने के कारण भारत में तापमान तेजी से बढ़ता है। मई में उत्तर-पश्चिम भारत का तापमान 45°C से 48°C तक पहुँच जाता है।
- उत्तर भारत में दोपहर के समय चलने वाली अत्यधिक गर्म और शुष्क पवनों को स्थानीय भाषा में ‘लू’ (Loo) कहा जाता है।
- तटीय भागों में आर्द्र हवाओं के कारण प्री-मानसून (Pre-monsoon) चक्रवाती वर्षा होती है, जिसे विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय नामों से जाना जाता है:
- आम्र वर्षा (Mango Showers): केरल और तटीय कर्नाटक में (यह आम की फसल को जल्दी पकाने में सहायक है)।
- काल बैसाखी (Kaal Baisakhi): पश्चिम बंगाल और असम में चलने वाले विनाशकारी शाम के तूफान।
३. वर्षा ऋतु या दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon) – जून से सितंबर
- यह भारत की मुख्य वर्षा ऋतु है, जिसमें देश की कुल वर्षा का लगभग 75% से 80% भाग प्राप्त होता है।
- जून के प्रथम सप्ताह में मानसून केरल के मालाबार तट पर टकराता है और धीरे-धीरे पूरे देश पर छा जाता है।
- प्रायद्वीपीय आकार के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून दो शाखाओं में विभाजित हो जाता है:
- अरब सागर की शाखा: यह पश्चिमी घाट से टकराकर पश्चिमी तटीय मैदान पर भारी वर्षा कराती है, तथा इसकी एक शाखा नर्मदा-तापी घाटियों से होती हुई मध्य भारत और अरावली के समानांतर बहती हुई पंजाब तक पहुँचती है।
- बंगाल की खाड़ी की शाखा: यह म्यांमार की अराकान पहाड़ियों से टकराकर उत्तर-पूर्वी भारत की ओर मुड़ती है। मेघालय की खासी पहाड़ियों में स्थित मासिनराम (Mawsynram) विश्व का सर्वाधिक वर्षा (11,000 मिमी से अधिक) प्राप्त करने वाला स्थान है।
४. मानसून का निवर्तन या शरद ऋतु (Retreating Monsoon) – अक्टूबर से नवंबर
- सूर्य के दक्षिणायन होने से स्थल भाग ठंडा होने लगता है और उत्तर-पश्चिम भारत पर उच्च वायुदाब बनने लगता है।
- इसके कारण मानसूनी पवनें पीछे हटने (लौटने) लगती हैं। अक्टूबर के दौरान आसमान साफ हो जाता है और तापमान थोड़ा बढ़ जाता है, लेकिन भूमि में नमी बनी रहती है। उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता के इस कष्टदायक मौसम को स्थानीय रूप से ‘कार्तिक की उमस’ (October Heat) कहा जाता है।
- लौटता हुआ मानसून नवंबर में बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरते हुए नमी ग्रहण करता है और तमिलनाडु (कोरोमंडल तट) पर वर्षा कराता है।
5. कोपेन का भारतीय जलवायु वर्गीकरण (Köppen’s Classification Summary)
व्लादिमीर कोपेन ने वनस्पति, तापमान और वर्षा की मात्रा के अंतर्संबंधों के आधार पर भारत को 9 जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया है:
| कोपेन कोड | जलवायु का प्रकार | भारत में मुख्य भौगोलिक विस्तार (क्षेत्र) |
|---|---|---|
| Amw | लघु शुष्क ऋतु वाला मानसून | गोवा के दक्षिण में भारत का पश्चिमी तट (मालाबार तट)। |
| As | शुष्क ग्रीष्म ऋतु वाला मानसून | तमिलनाडु का कोरोमंडल तट और दक्षिणी आंध्र प्रदेश। |
| Aw | उष्णकटिबंधीय सवाना जलवायु | कर्क रेखा के दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार का अधिकांश भाग। |
| Bshw | अर्द्ध-शुष्क स्टेपी जलवायु | अरावली के पश्चिम में मध्यवर्ती राजस्थान, पश्चिमी पंजाब, हरियाणा। |
| Bwhw | उष्ण मरुस्थलीय जलवायु | थार मरुस्थल (पश्चिमी राजस्थान का सुदूर भाग)। |
| Cwg | शुष्क शीत ऋतु मानसूनी गंगा तुल्य | उत्तर भारत का विशाल मैदान, गंगा का मैदान, असम, पूर्वी राजस्थान। |
| Dfc | लघु ग्रीष्म आर्द्र शीत ऋतु | सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और पूर्वी असम। |
| Et | टुण्ड्र तुल्य पर्वतीय जलवायु | उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के उच्च पर्वतीय क्षेत्र। |
| E | ध्रुवीय तुल्य हिमाच्छादित | जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के अति उच्च क्षेत्र। |
6. विश्वविद्यालय परीक्षा हेतु विशेष मार्गदर्शन (Exam Tips)
बी.ए. भूगोल के परीक्षार्थियों के लिए उत्तर-लेखन की विशेष रणनीतियाँ:
- सटीक चित्रों का प्रयोग: मानसून की उत्पत्ति के सिद्धांतों (विशेष रूप से तापीय और जेट स्ट्रीम सिद्धांत) की व्याख्या करते समय भारत का एक आउटलाइन मानचित्र बनाकर हवाओं के प्रवाह की दिशा, तिब्बत का पठार और आईटीसीजेड (ITCZ) की स्थिति को आरेख द्वारा अवश्य समझाएं।
- पारिभाषिक शब्दावली को रेखांकित करना: उत्तर पुस्तिका में भौगोलिक शब्दों जैसे—आईटीसीजेड (ITCZ), तापीय विपरीतता, पूर्वा जेट स्ट्रीम, मावठ, कयाल, और कार्तिक की उमस (October Heat) को काले पेन से अंडरलाइन करें।
- ऋतु चक्र का प्रवाह आरेख (Flow Chart): परीक्षा में ऋतुओं पर प्रश्न आने पर सीधे उत्तर शुरू करने से पहले चारों ऋतुओं का चक्र दर्शाता हुआ एक सुंदर फ्लो चार्ट (Flow Chart) अवश्य बनाएं।