भारत का अपवाह तंत्र (Drainage System of India): विस्तृत नोट्स

भारत का अपवाह तंत्र (Drainage System of India): विस्तृत नोट्स

1. अपवाह तंत्र की मूल संकल्पना एवं शब्दावली (Basic Concepts and Terminology)

भारतीय नदी प्रणाली को समझने से पूर्व उससे संबंधित कुछ बुनियादी भौगोलिक शब्दावलियों और संकल्पनाओं को समझना अत्यंत आवश्यक है:

  • अपवाह (Drainage): जल के अपने निश्चित वाहिकाओं (Channels) या जलमार्गों के माध्यम से होने वाले प्रवाह को ‘अपवाह’ कहते हैं।
  • अपवाह तंत्र (Drainage System): जब मुख्य नदी अपनी सहायक नदियों के साथ मिलकर एक जालनुमा जलमार्ग का निर्माण करती है, तो इस संपूर्ण वाहिकाओं के तंत्र को ‘अपवाह तंत्र’ कहा जाता है।
  • अपवाह द्रोणी (Drainage Basin): एक मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा अपवाहित या सिंचित संपूर्ण क्षेत्र को ‘अपवाह द्रोणी’ या ‘नदी बेसिन’ कहते हैं।
  • जल विभाजक (Water Divide): दो निकटवर्ती अपवाह द्रोणियों को एक-दूसरे से अलग करने वाली कोई भी उच्च भूमि या पर्वतीय क्षेत्र ‘जल विभाजक’ कहलाता है (जैसे—अरावली पर्वत श्रृंखला और अंबाला के निकट की उच्च भूमि सिंधु और गंगा नदी तंत्र के बीच एक प्रमुख जल विभाजक का कार्य करती है)।
  • जल-संभर (Watershed): छोटी नदियों और नालों द्वारा अपवाहित लघु क्षेत्रों को ‘जल-संभर’ कहा जाता है। नदी द्रोणी का आकार बहुत बड़ा होता है, जबकि जल-संभर का आकार अपेक्षाकृत छोटा और स्थानीय होता है।

प्रमुख अपवाह प्रतिरूप (Drainage Patterns)

नदियां अपने ढाल, भूगर्भीय संरचना और जलवायुविक दशाओं के अनुसार विशिष्ट आकृतियों या प्रतिरूपों का निर्माण करती हैं, जिन्हें निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जाता है:

  1. वृक्षाकार प्रतिरूप (Dendritic Pattern): जब मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियां मिलकर एक वृक्ष की शाखाओं जैसी आकृति बनाती हैं। यह प्रतिरूप मुख्य रूप से समतल मैदानी भागों में विकसित होता है (उदा. गंगा और उसकी सहायक नदियां)।
  2. अरीय प्रतिरूप (Radial Pattern): जब नदियां किसी केंद्रीय ऊंचे पठार या गुंबदाकार पहाड़ी से निकलकर चारों दिशाओं में प्रवाहित होती हैं (उदा. अमरकंटक पहाड़ी से निकलने वाली नर्मदा, सोन और जोहिला नदियां)।
  3. जालीनुमा प्रतिरूप (Trellis Pattern): जब मुख्य नदियां एक-दूसरे के समानांतर बहती हैं और उनकी सहायक नदियां उनसे समकोण (90 डिग्री) पर आकर मिलती हैं। यह वलित पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है।
  4. अभिकेंद्री प्रतिरूप (Centripetal Pattern): जब सभी दिशाओं से नदियां बहकर किसी एक केंद्रीय गर्त, गढ्ढे या झील में आकर विसर्जित होती हैं (उदा. मणिपुर की लोकताक झील में गिरने वाली नदियां)।

2. हिमालयी और प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र में तुलना (Himalayan vs Peninsular Rivers)

भारत के अपवाह तंत्र को उसकी भूगर्भीय उत्पत्ति और प्रकृति के आधार पर दो मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है: हिमालयी अपवाह तंत्र और प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र। विश्वविद्यालय परीक्षा में इन दोनों प्रणालियों के बीच अंतर बार-बार पूछा जाता है।

तुलनात्मक तालिका:

अंतर का आधारहिमालयी अपवाह तंत्रप्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र
1. उद्गम स्थलइनका उद्गम ऊंचे हिमालय पर्वतों और हिमनदों (Glaciers) से होता है।इनका उद्गम मध्य भारत के पठारी भागों और पश्चिमी घाट से होता है।
2. प्रवाह की प्रकृतिये बारहमासी (Perennial) नदियां हैं, क्योंकि इन्हें वर्षा के अतिरिक्त हिमनदों के पिघलने से भी जल प्राप्त होता है।ये मौसमी (Seasonal) नदियां हैं, जो पूरी तरह वर्षा जल पर निर्भर होती हैं। शुष्क ऋतु में इनका जल स्तर बहुत कम हो जाता है।
3. नदी की अवस्थाये नदियां नवीन वलित पर्वतों से बहने के कारण अभी अपनी युवावस्था (Youthful Stage) में हैं।ये अत्यंत प्राचीन पठारी भागों से बहती हैं, अतः ये अपनी प्रौढ़ावस्था या वृद्धावस्था (Mature Stage) में हैं।
4. घाटियों का आकारये नदियां पर्वतीय क्षेत्रों में गहरे गॉर्ज, V-आकार की घाटियों और महाखड्डों का निर्माण करती हैं।इनकी घाटियां उथली, चौड़ी और लगभग समतल (U-आकार की) होती हैं, जिनका ढाल अत्यंत मंद होता है।
5. मार्ग परिवर्तनये नदियां मैदानी भागों में विसर्प (Meanders) बनाती हैं और अपना मार्ग बदलने के लिए जानी जाती हैं (जैसे कोसी नदी)।ये नदियां अपने कठोर चट्टानी धरातल के कारण स्थिर मार्ग पर बहती हैं और विसर्पों का निर्माण नहीं करतीं।
6. जलविद्युत क्षमतातीव्र ढाल और बारहमासी प्रवाह के कारण इनकी जलविद्युत उत्पादन क्षमता अत्यधिक उच्च है।मौसमी प्रवाह और मंद ढाल के कारण जलविद्युत क्षमता अपेक्षाकृत सीमित है।

3. हिमालयी अपवाह तंत्र (Himalayan Drainage System)

हिमालयी अपवाह तंत्र के अंतर्गत तीन प्रमुख नदी प्रणालियों को शामिल किया जाता है:

(क) सिंधु नदी तंत्र (Indus River System)

  • उद्गम: तिब्बत में कैलाश पर्वत श्रेणी के उत्तरी ढाल पर मानसरोवर झील के निकट ‘बोखर चू’ (Bokhar Chu) हिमनद से।
  • कुल लंबाई: 2,880 किलोमीटर (भारत में इसकी लंबाई लगभग 1,114 किमी है)। यह अंततः पाकिस्तान से बहते हुए अरब सागर में विसर्जित होती है।
  • पंचनद (Panchnad): सिंधु की पांच प्रमुख पूर्वी सहायक नदियां पंजाब का निर्माण करती हैं:
    1. झेलम (Jhelum): पीर पंजाल के गिरिपद में स्थित वेरीनाग झरने से निकलती है और वूलर झील से होकर बहती है।
    2. चेनाब (Chenab): यह सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी है, जो हिमाचल प्रदेश में चंद्रा और भागा नामक दो नदियों के मिलाप (तांडी के पास) से बनती है।
    3. रावी (Ravi): हिमाचल प्रदेश की रोहतांग दर्रे के पास से निकलती है।
    4. व्यास (Beas): रोहतांग दर्रे के निकट व्यास कुंड से निकलती है और पंजाब के हरिके में सतलुज नदी से मिल जाती है।
    5. सतलुज (Sutlej): तिब्बत में मानसरोवर के निकट राक्षस ताल (Rakas Lake) से निकलती है और शिपकी ला दर्रे से भारत में प्रवेश करती है। इसी नदी पर प्रसिद्ध भाखड़ा-नांगल बहुउद्देशीय परियोजना निर्मित है।

(ख) गंगा नदी तंत्र (Ganga River System)

यह भारत का सबसे बड़ा और पवित्र नदी तंत्र है, जो देश के एक बहुत बड़े उपजाऊ भूभाग को सिंचित करता है।

  • उद्गम: उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री हिमनद से भागीरथी के रूप में। देवप्रयाग में जब भागीरथी और अलकनंदा आपस में मिलती हैं, तब इसका नाम संयुक्त रूप से ‘गंगा’ पड़ता है।
  • कुल लंबाई: 2,525 किलोमीटर
  • सहायक नदियां:
    • बाएं किनारे से मिलने वाली (उत्तर से): रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी (इसे अपनी अनियंत्रित बाढ़ों के कारण ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है) और महानंदा।
    • दाएं किनारे से मिलने वाली (दक्षिण से): यमुना (गंगा की सबसे लंबी सहायक नदी जो यमुनोत्री हिमनद से निकलती है और प्रयागराज में गंगा से मिलती है) तथा सोन नदी (जो अमरकंटक पठार से सीधे आकर गंगा में मिलती है)।
  • यह अंततः बांग्लादेश में प्रवेश करती है जहाँ इसे ‘पद्मा’ कहा जाता है, और ब्रह्मपुत्र (जमुना) के साथ मिलकर विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा ‘सुंदरवन डेल्टा’ बनाती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

(ग) ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र (Brahmaputra River System)

  • उद्गम: तिब्बत में मानसरोवर झील के निकट चेमयुंग-डुंग हिमनद से। तिब्बत में इसे स्थानीय भाषा में ‘त्सांगपो’ (Tsangpo – अर्थात शोधक) कहा जाता है।
  • भारत में प्रवेश: यह अरुणाचल प्रदेश में नामचा बरवा पर्वत शिखर के पास एक गहरा गॉर्ज बनाती हुई ‘दिहांग’ नाम से भारत में प्रवेश करती है। असम घाटी में इसे ‘ब्रह्मपुत्र’ कहा जाता है।
  • माजुली द्वीप (Majuli Island): असम में ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य स्थित ‘माजुली’ विश्व का सबसे बड़ा नदीय द्वीप (River Island) है, जिसे असम सरकार ने एक जिला घोषित किया है।
  • सहायक नदियां: दिबांग, लोहित, सुबनसिरी, धनसिरी, मानस, कामेंग और तीस्ता।
  • बांग्लादेश में इसे ‘जमुना’ कहा जाता है, जहाँ यह पद्मा (गंगा) से मिलकर ‘मेघना’ नाम से बंगाल की खाड़ी में विसर्जित होती है।

4. प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (Peninsular Drainage System)

प्रायद्वीपीय भारत का अपवाह तंत्र अत्यंत प्राचीन है। यहाँ की नदियों को उनके बहने की दिशा और विसर्जन के आधार पर दो मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है:


(क) पूर्व की ओर बहने वाली नदियां (East Flowing Rivers – बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली)

ये नदियां मुख्य रूप से पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं और अपने मुहानों पर अत्यंत उपजाऊ और विशाल डेल्टा का निर्माण करती हैं:

  1. गोदावरी नदी (Godavari):
    • यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी (1,465 किमी) है।
    • इस विशाल आकार के कारण इसे ‘दक्षिण गंगा’ या ‘वृद्ध गंगा’ भी कहा जाता है।
    • उद्गम: महाराष्ट्र के नासिक जिले में त्र्यंबक पहाड़ी से।
  2. कृष्णा नदी (Krishna):
    • लंबाई लगभग 1,400 किमी।
    • उद्गम: महाराष्ट्र में पश्चिमी घाट के महाबलेश्वर के निकट से। इसकी प्रमुख सहायक नदियां तुंगभद्रा, भीमा, कोयना और मूसी हैं। इस पर प्रसिद्ध नागार्जुन सागर बांध बना हुआ है।
  3. कावेरी नदी (Kaveri):
    • यह दक्षिण भारत की एक अत्यंत पवित्र नदी है, जिसमें वर्षभर जल का प्रवाह अपेक्षाकृत स्थिर रहता है (क्योंकि इसे ऊपरी बेसिन में दक्षिण-पश्चिम मानसून से और निचले बेसिन में उत्तर-पूर्वी मानसून से वर्षा प्राप्त होती है)।
    • उद्गम: कर्नाटक के कोडागु जिले की ब्रह्मगिरि पहाड़ियों से। इस पर प्रसिद्ध शिवसमुद्रम जलप्रपात स्थित है।
  4. महानदी (Mahanadi):
    • उद्गम: छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में सिहावा पहाड़ी के निकट से। उड़ीसा में बहते हुए यह बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसी नदी पर भारत का सबसे लंबा बांध ‘हीराकुंड बांध’ निर्मित है।

(ख) पश्चिम की ओर बहने वाली नदियां (West Flowing Rivers – अरब सागर में गिरने वाली)

ये नदियां मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत के कठोर भूभाग की दरारों या भ्रंश घाटियों (Rift Valleys) से होकर बहती हैं और डेल्टा न बनाकर ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं:

  1. नर्मदा नदी (Narmada):
    • उद्गम: मध्य प्रदेश में अमरकंटक की पहाड़ियों से।
    • यह विंध्याचल और सतपुड़ा श्रेणियों के मध्य भ्रंश घाटी (Rift Valley) से होकर बहती है।
    • जबलपुर के निकट यह संगमरमर की चट्टानों में अत्यंत सुंदर ‘धुआंधार जलप्रपात’ का निर्माण करती है। इस पर सरदार सरोवर परियोजना बनाई गई है।
  2. तापी नदी (Tapi/Tapti):
    • उद्गम: मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मुलताई नामक स्थान से। यह भी नर्मदा के समानांतर दक्षिण में भ्रंश घाटी से होकर बहती है और इसे ‘नर्मदा की जुड़वां’ नदी कहा जाता है।

5. पश्चिमी तट की नदियों की विशेष प्रकृति: ज्वारनदमुख (Estuary) बनाम डेल्टा

पश्चिमी घाट से निकलकर अरब सागर (पश्चिम की ओर) में गिरने वाली छोटी नदियां (जैसे शरावती, मांडवी, जुआरी, पेरियार) अपने मुहाने पर डेल्टा का निर्माण नहीं करतीं, बल्कि ज्वारनदमुख (Estuary) बनाती हैं। इसके पीछे निम्नलिखित वैज्ञानिक कारण हैं:

  1. तीव्र ढाल (Steep Gradient): पश्चिमी घाट अरब सागर के अत्यंत निकट स्थित है और इसका ढाल बहुत तीव्र है। इस कारण नदियां अत्यधिक वेग के साथ बहती हैं।
  2. कठोर चट्टानी धरातल: ये नदियां प्राचीन व कठोर चट्टानी धरातल से बहती हैं, जिससे इनका अपरदन कार्य बहुत सीमित होता है।
  3. छोटा प्रवाह मार्ग: समुद्र के अत्यंत निकट होने के कारण इनका प्रवाह मार्ग बहुत छोटा होता है।
  4. गाद या अवसाद की कमी: छोटा मार्ग और कठोर चट्टान होने के कारण इन नदियों में मिट्टियों और गाद (Silt) की मात्रा नगण्य होती है। तीव्र वेग के कारण जो भी थोड़ा-बहुत अवसाद होता है, उसे नदियां सीधे समुद्र में बहा ले जाती हैं, जिससे डेल्टा के जमाव के लिए समय व स्थान नहीं मिल पाता।

6. राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना एवं पर्यावरणीय मुद्दे (Interlinking & Issues)

  • नदी अंतराबंधन परियोजना (River Interlinking Project): भारत में बाढ़ और सूखे की दोहरी समस्या से निपटने के लिए अधिशेष जल वाली नदियों (जैसे हिमालयी नदियां) के पानी को जल की कमी वाली नदियों (प्रायद्वीपीय नदियां) की ओर मोड़ने की एक महत्वाकांक्षी योजना है। भारत की पहली सफल परियोजना ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ है।
  • अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद: भारत में जल संसाधनों के असमान वितरण के कारण राज्यों के बीच जल के बंटवारे को लेकर गंभीर विवाद हैं, जिनमें कावेरी नदी जल विवाद (कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच) तथा कृष्णा जल विवाद प्रमुख हैं।
  • नदी प्रदूषण: औद्योगिक सीवेज, घरेलू कचरे और कृषि रसायनों के सीधे विसर्जन के कारण भारतीय नदियां गंभीर प्रदूषण की चपेट में हैं। केंद्र सरकार द्वारा गंगा के शुद्धिकरण के लिए ‘नमामि गंगे’ जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं चलाई जा रही हैं।

7. विश्वविद्यालय परीक्षा हेतु विशेष मार्गदर्शन (MDSU Exam Tips)

एमडीएसयू अजमेर के भूगोल के छात्र परीक्षा में उत्तर लिखते समय इन बिंदुओं का विशेष ध्यान रखें:

  • रेखाचित्र (Flow Diagrams): नदी प्रणालियों को लिखते समय सीधे बड़े पैराग्राफ लिखने के बजाय उनका एक स्पष्ट फ्लो-चार्ट (जैसे: गंगा नदी ➔ अलकनंदा + भागीरथी का मिलन (देवप्रयाग)) बनाकर समझाएं।
  • नक्शा बनाना अनिवार्य है: यदि परीक्षा में ‘हिमालयी अपवाह तंत्र’ पर बड़ा निबंधात्मक प्रश्न आता है, तो उत्तर पुस्तिका में भारत का एक सुंदर मानचित्र बनाकर सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र की मुख्य धाराओं को उनकी दिशा के साथ अवश्य अंकित करें।
  • तुलनात्मक तालिका का प्रयोग: हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियों के अंतर को स्पष्ट करने के लिए हमेशा तुलनात्मक तालिका का ही प्रयोग करें, इससे पूर्ण अंक प्राप्त करने की संभावना बढ़ जाती है।
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