प्राचीन एवं पूर्व-मध्यकालीन भारत: इकाई 3
1. राजव्यवस्था और अर्थव्यवस्था: 750–1000 ई. (Polity and Economy: 750–1000 A.D.)
(A) उत्तर भारत: गुर्जर-प्रतिहार, पाल और सेन राजवंश (North India: Gurjara-Pratiharas, Palas, Senas)
- गुर्जर-प्रतिहार राजवंश:
- उत्पत्ति व संस्थापक: इस राजवंश की नींव हरिश्चंद्र ने जोधपुर क्षेत्र में रखी थी, जबकि नागभट्ट प्रथम ने मालवा क्षेत्र में इसे सुदृढ़ राजनीतिक आधार प्रदान किया।
- कन्नौज का त्रिपक्षीय संघर्ष (Tripartite Struggle): हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद उत्तर भारत की राजनीतिक राजधानी कन्नौज (कान्यकुब्ज) पर अधिकार के लिए गुर्जर-प्रतिहार, पाल और दक्षिण के राष्ट्रकूटों के बीच लगभग दो शताब्दियों तक संघर्ष चला। अंततः नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज पर अधिकार कर इसे अपनी राजधानी बनाया।
- मिहिर भोज (भोज प्रथम): 836 ई. में सिंहासन पर बैठे मिहिर भोज इस वंश के सबसे महान शासक थे। उन्होंने ‘आदिवराह’ की उपाधि धारण की और चांदी के सिक्के जारी किए। अरब यात्री सुलेमान ने मिहिर भोज (जुज़्र/Juzr) की विशाल सैन्य शक्ति, समृद्ध अश्वसेना और आर्थिक वैभव का उल्लेख किया है।
- पतन: 10वीं शताब्दी की शुरुआत में राष्ट्रकूट राजा इंद्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण कर शहर को तहस-नहस कर दिया, जिससे प्रतिहार साम्राज्य खंडित होकर परमार, चंदेल और चौहान जैसे प्रांतीय राज्यों में बंट गया।
- पाल राजवंश (बंगाल व बिहार):
- स्थापना: 750 ई. में गौड़ (बंगाल) की जनता द्वारा मत्स्यन्याय (अराजकता) को समाप्त करने के लिए गोपाल को राजा चुना गया।
- प्रमुख शासक व बौद्ध धर्म का संरक्षण: धर्मपाल और देवपाल इस वंश के महान शासक हुए। इन्होंने बौद्ध धर्म (वज्रयान/महायान) को संरक्षण दिया। नालंदा महाविहार के रखरखाव के लिए गाँव दान दिए तथा प्रसिद्ध विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की।
- सेन राजवंश:
- पाल साम्राज्य के कमजोर होने पर 11वीं-12वीं शताब्दी में बंगाल में सेन वंश की स्थापना हुई। इसके प्रसिद्ध शासक लक्ष्मणसेन थे, जिनके दरबार में गीतगोविंद के रचयिता जयदेव रहते थे।
- राजव्यवस्था एवं अर्थव्यवस्था:
- सामंती ढांचा: राजा सर्वोच्च शक्ति था, जो ‘परमेश्वर’, ‘परमभट्टारक’ और ‘महाराजाधिराज’ जैसी उपाधियां धारण करता था। साम्राज्य सामंतों (माडलिक/सामंत) और प्रशासनिक अधिकारियों (दंडनायक, भंडागारिक) के माध्यम से प्रशासित होता था।
- कृषि व राजस्व: अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था। राज्य भू-राजस्व के रूप में उपज का 1/6 से 1/4 भाग कर के रूप में एकत्र करता था।
- व्यापार व मुद्रा: स्थायी सेनाओं के रख-रखाव और घोड़ों के आयात हेतु सिक्कों (जैसे चांदी के द्रम/सिक्के) का प्रचलन बना रहा।
(B) दक्षिण भारत: राष्ट्रकूट और चोल राजवंश (South India: Rashtrakutas and Cholas)
- राष्ट्रकूट राजवंश (दक्कन):
- स्थापना व विस्तार: दंतिदुर्ग ने चालुक्यों को पराजित कर 8वीं शताब्दी के मध्य में राष्ट्रकूट साम्राज्य की नींव रखी और मान्यखेत (Malkhed) को राजधानी बनाया। राष्ट्रकूटों ने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक और राजनीतिक सेतु का कार्य किया।
- महान शासक: अमोघवर्ष प्रथम (महान साहित्य अनुरागी जिन्होंने कविराजमार्ग की रचना की), कृष्ण तृतीय और इंद्र तृतीय प्रमुख शासक थे।
- प्रशासनिक विभाजन: साम्राज्य प्रांतों (राष्ट्र – प्रमुख: राष्ट्रपति), जिलों (विषय – प्रमुख: विषयपति) और भुक्ति (50-70 गाँवों का समूह – प्रमुख: भोगपति) में विभाजित था।
- चोल राजवंश (तंजौर के साम्राज्यवादी चोल):
- उत्थान: 850 ई. में विजयालय ने पल्लवों की अधीनता से मुक्त होकर तंजावुर (तंजौर) पर अधिकार किया और चोल वंश के पुनरुद्धार की नींव रखी।
- राजराज प्रथम (985–1014 ई.):
- इन्होंने चेर नौसेना को कंदलूर शालै में पराजित किया, पांड्यों को वश में किया और उत्तरी श्रीलंका को जीतकर ‘मुम्मुडि-चोलमैंडलम’ नाम दिया।
- 1010 ई. में तंजावुर में द्रविड़ स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना बृहदीश्वर (राजराजेश्वर) शिव मंदिर बनवाया।
- राजेन्द्र प्रथम (1014–1044 ई.):
- इन्होंने संपूर्ण श्रीलंका पर अधिकार कर लिया।
- उत्तर भारत अभियान में बंगाल के पाल शासक महिपाल प्रथम को पराजित किया तथा इस विजय के उपलक्ष्य में ‘गंगैकोंडचोल’ की उपाधि ली और गंगैकोंडचोलपुरम नगर तथा ‘चोलगंगम’ नामक विशाल सिंचाई तालाब बनवाया।
- चोल प्रशासन और अर्थव्यवस्था:
- स्वायत्त ग्रामीण प्रशासन (Local Self-Government): चोल प्रशासन की सबसे अनूठी विशेषता इसका ग्रामीण स्वशासन था। गाँव दो प्रकार के थे: ‘ऊर’ (सामान्य सर्व-जातीय ग्रामीणों की सभा) और ‘सभा/महासभा’ (ब्राह्मणों के अग्रहार गाँवों की सभा, जो समितियों या ‘वारियम’ द्वारा कार्य करती थी)।
- राजस्व व भूमि सर्वेक्षण: राजराज प्रथम और कुलोत्तुंग प्रथम ने भूमि का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया। भूमि मापने की इकाइयां ‘कुलिस’, ‘मा’ और ‘वेली’ थीं। भू-राजस्व विभाग को ‘पुरवुवरि-तिणैक्कलम’ कहा जाता था।
- व्यापारिक श्रेणियाँ (Guilds): व्यापारियों की सभा को ‘नगरम’ कहा जाता था। ‘ऐय्यावोल’ (Ayyavole/500 Lords) और ‘मणिग्रामम’ (Manigramam) जैसी शक्तिशाली व्यापारिक श्रेणियों ने देश-विदेश में व्यापार का संचालन किया।
2. वैश्विक संबंध (Global Relations)
(A) दक्षिण-पूर्व एशिया और श्रीलंका के साथ समकालीन संबंध (Contemporary Relations with SE Asia and Sri Lanka)
- सुवर्णद्वीप/सुवर्णभूमि से संबंध: प्राचीन भारतीय ग्रंथों में दक्षिण-पूर्व एशिया को ‘सुवर्णभूमि’ या ‘सुवर्णद्वीप’ कहा गया है। ईसा की शुरुआती शताब्दियों से ही भारतीय व्यापारियों, बौद्ध भिक्षुओं और ब्राह्मणों के माध्यम से संस्कृत भाषा, धर्म (शैव, वैष्णव व बौद्ध) तथा स्थापत्य कला का प्रसार मलय प्रायद्वीप, सुमात्रा, जावा, कंबोडिया (अंगकोर वाट) और थाईलैंड में हुआ।
- श्रीलंका के साथ संबंध:
- प्राचीन काल से ही श्रीलंका (ताम्रपर्णी/सिंहल) के साथ घनिष्ठ संबंध रहे हैं।
- चोल राजा राजराज प्रथम ने उत्तरी श्रीलंका पर और राजेन्द्र प्रथम ने संपूर्ण श्रीलंका पर अधिकार कर अनुराधापुर के स्थान पर पोलोन्नरुवा को प्रांतीय राजधानी बनाया और वहाँ शिव मंदिरों का निर्माण कराया।
- व्यापारिक श्रेणियों की वैश्विक उपस्थिति:
- दक्षिण भारतीय व्यापारिक श्रेणी ‘मणिग्रामम’ का एक नौसैनिक व व्यापारिक अड्डा थाईलैंड के ‘ताकुआपा’ (Takuapa) में स्थित था।
- ‘ऐय्यावोल’ (Ayyavole) श्रेणी का 1088 ई. का एक तमिल अभिलेख सुमात्रा के ‘लोबोए तुवा’ (Loboe Toewa) से प्राप्त हुआ है।
- चीन के फुजियान प्रांत (Quanzhou) में तमिल व्यापारियों की बस्ती और हिंदू मंदिरों के अवशेष मिले हैं, जहाँ से तमिल-चीनी द्विभाषी अभिलेख भी प्राप्त हुआ है।
(B) चोलों की विदेश नीति एवं नौसैनिक अभियान (Foreign Policy of the Cholas)
- शक्तिशाली नौसेना का गठन: चोल राजाओं के पास एक सुसंगठित और विशाल नौसेना (Navy) थी, जिसके बल पर उन्होंने बंगाल की खाड़ी को एक प्रकार से ‘चोल झील’ (Chola Lake) में बदल दिया था।
- श्रीविजय (Srivijaya) के साथ संबंध और परिवर्तन:
- मलय प्रायद्वीप और इंडोनेशियाई द्वीपों पर स्थित श्रीविजय साम्राज्य (शैलेंद्र राजवंश) के साथ शुरुआत में चोलों के मैत्रिपूर्ण संबंध थे।
- 1006 ई. में श्रीविजय के राजा मारविजयोत्तुंगवर्मन ने चोल तटीय नगर नागपट्टिनम में ‘चूड़ामणि विहार’ नामक बौद्ध मठ बनवाया, जिसके संचालन हेतु राजराज प्रथम ने एक गाँव का राजस्व दान में दिया।
- राजेन्द्र प्रथम का श्रीविजय नौसैनिक अभियान (1025 ई.):
- कारण: श्रीविजय साम्राज्य मलक्का जलडमरूमध्य और सुंडा जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण रखता था। चीन के साथ होने वाले भारतीय व्यापार में बाधा डालने और समुद्री व्यापारिक एकाधिकार को तोड़ने के उद्देश्य से राजेन्द्र प्रथम ने यह अभियान चलाया।
- अभियान व परिणाम: 1025 ई. में चोल नौसेना ने श्रीविजय की राजधानी पालमबांग, केडाह (कडारम) और सुमात्रा के बंदरगाहों पर एक त्वरित और सफल नौसैनिक हमला किया। श्रीविजय के राजा संग्राम विजयोत्तुंगवर्मन को बंदी बना लिया गया। इस विजय के बाद राजेन्द्र प्रथम ने ‘कडारमकोंडन’ की उपाधि धारण की।
- चीन के साथ कूटनीतिक दूतमंडल: चोल राजाओं ने चीन के सांग (Song) राजवंश के दरबार में कई व्यापारिक व कूटनीतिक दूत भेजे। कुलोत्तुंग प्रथम ने 1077 ई. में 72 व्यापारियों का एक विशाल दूतमंडल चीन भेजा था।
3. विदेशी आक्रमण और संघर्ष (Invasions and Conflicts)
(A) अरबों के आक्रमण (Arab Invasions)
- पृष्ठभूमि एवं कारण: 7वीं शताब्दी में इस्लाम के उदय के बाद अरबों ने प्रादेशिक विस्तार शुरू किया। भारत में उनका पहला सफल सैन्य अभियान 712 ई. (8वीं शताब्दी) में हुआ। इसका तात्कालिक कारण देबल बंदरगाह के पास समुद्री डाकुओं द्वारा उमय्यद खलीफा के लिए भेजे जा रहे जहाजों की लूटपाट था, जिसकी क्षतिपूर्ति सिंध के राजा दाहिर ने करने से मना कर दिया था।
- मोहम्मद बिन कासिम का अभियान (712 ई.):
- इराकी गवर्नर हज्जाज के 17 वर्षीय भतीजे और सेनापति मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया।
- उसने देबल, निरून और सेहवान पर अधिकार करने के बाद रावर के युद्ध में सिंध के शासक राजा दाहिर को पराजित कर मार डाला।
- इसके बाद कासिम ने अलोर, ब्राह्मणवाद और मुल्तान (‘स्वर्ण नगर’) पर अधिकार कर लिया।
- स्रोत व प्रभाव:
- सिंध विजय का प्रामाणिक विवरण फारसी ग्रंथ ‘चचनामा’ में मिलता है।
- प्रभाव: अरबों का शासन केवल सिंध और मुल्तान तक ही सीमित रहा; गुर्जर-प्रतिहारों (नागभट्ट प्रथम) और चालुक्यों ने उन्हें आगे भारत के भीतरी भागों (मालवा/गुजरात) में बढ़ने से रोक दिया।
- लेन-पूल के शब्दों में, “अरबों की सिंध विजय भारत और इस्लाम के इतिहास में केवल एक घटना मात्र थी, जिसका कोई स्थायी परिणाम नहीं निकला।” हालांकि, सांस्कृतिक रूप से अरबों ने भारतीय गणित, शून्य, खगोलशास्त्र (ब्रह्मगुप्त के ब्रह्म सिद्धांत का अरबी अनुवाद) और आयुर्वेद का ज्ञान सीखा और इसे यूरोप तक पहुंचाया।
(B) गजनवी और गोरी के आक्रमण (Invasions of Ghaznavis and Ghoris)
1. महमूद गजनवी के आक्रमण (997–1030 ई.)
- उद्देश्य: तुर्की शासक महमूद गजनवी का मुख्य उद्देश्य भारत की अपार धन-संपदा को लूटना और अपनी राजधानी गजनी को एक वैभवशाली नगर बनाना था, न कि भारत में स्थायी साम्राज्य स्थापित करना।
- 17 बार आक्रमण (1000–1027 ई.): महमूद ने भारत पर कुल 17 बार आक्रमण किए:
- जयपाल व आनंदपाल (हिंदूशाही वंश): 1001 ई. में पेशावर के निकट हिंदूशाही राजा जयपाल को पराजित किया। 1008 ई. में वाईहिंद के युद्ध में जयपाल के पुत्र आनंदपाल के नेतृत्व वाले राजपूत संघ को हराया।
- नगरकोट, मथुरा व कन्नौज: 1009 ई. में नगरकोट (कांगड़ा) के मंदिरों तथा 1018 ई. में पवित्र नगर मथुरा और कन्नौज के प्रतिहार राजा राज्यपाल को पराजित कर प्रचुर धन लूटा।
- सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण (1025 ई.): महमूद का सबसे प्रसिद्ध और भीषण 16वां आक्रमण गुजरात के सोमनाथ शिव मंदिर पर हुआ। उसने मंदिर के विशाल शिवलिंग को तोड़ा और लगभग 20 मिलियन दीनार मूल्य की संपत्ति लूटी।
- दरबारी विद्वान:
- अल-बरूनी: महमूद के साथ भारत आया और प्रसिद्ध संस्कृत-आधारित शोध ग्रंथ ‘किताब-उल-हिंद’ (तहकीक-ए-हिंद) लिखा।
- फिरदौसी: महाकाव्य ‘शाहनामा’ के रचयिता जिन्हें ‘पूर्व का होमर’ कहा जाता है।
2. मोहम्मद गोरी के आक्रमण (1149–1206 ई.)
- उद्देश्य: गजनवी के विपरीत, मुइज्जुद्दीन मोहम्मद गोरी का उद्देश्य भारत में स्थायी मुस्लिम (तुर्की) साम्राज्य की स्थापना करना था।
- प्रारंभिक अभियान: 1175 ई. में मुल्तान को जीता। 1178 ई. में गुजरात के अणहिलवाड़ पर आक्रमण किया, जहाँ सोलंकी/चालुक्य राजा मूलराज द्वितीय (भीमदेव द्वितीय) और उनकी माता नाइकी देवी ने गोरी को बुरी तरह पराजित कर खदेड़ दिया (यह भारत में गोरी की पहली पराजय थी)।
(C) पृथ्वीराज चौहान और तराइन के युद्ध (Prithviraj Chauhan and Battles of Tarain)
- पृथ्वीराज तृतीय (पृथ्वीराज चौहान): अजमेर और दिल्ली के प्रतापी चौहान (चाहमान) राजा थे। उनके दरबारी कवि चंदबरदाई ने ‘पृथ्वीराज रासो’ और जयानक ने ‘पृथ्वीराज विजय’ की रचना की।
- तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.):
- भटिंडा (सरहिंद) पर गोरी के अधिकार को लेकर पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गोरी की सेनाएं करनाल (हरियाणा) के पास तराइन के मैदान में भिड़ीं।
- पृथ्वीराज चौहान की सेना ने गोरी को बुरी तरह पराजित किया। गोरी युद्ध में घायल हुआ और अपनी जान बचाकर गजनी भाग गया।
- तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.):
- 1192 ई. में गोरी 1,20,000 की सुसज्जित और अनुशासित घुड़सवार सेना के साथ पुनः तराइन पहुँचा।
- इस युद्ध में गोरी ने छल-कपट और बेहतर रणनीतिक सैन्य संचालन से राजपूत सेना को पराजित किया। पृथ्वीराज चौहान को बंदी बना लिया गया और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
- महत्व: तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ, जिसने भारत में तुर्की सत्ता और दिल्ली सल्तनत की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
- चंदावर का युद्ध (1194 ई.): गोरी ने कन्नौज के गाहड़वाल राजा जयचंद को यमुना तट पर चंदावर के युद्ध में पराजित कर मार डाला।
- तुर्की साम्राज्य का सुदृढ़ीकरण: गोरी के भारत से वापस लौटने पर उसके योग्य दास सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने उत्तर भारत के विजित प्रदेशों की कमान संभाली, जबकि बख्तियार खिलजी ने बिहार और बंगाल पर आक्रमण कर नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया।