प्राचीन भारत का इतिहास: इकाई 2
1. नए धार्मिक आंदोलन: उत्तर भारत में जैन धर्म और बौद्ध धर्म (New Religious Movements: Jainism and Buddhism in North India)
(A) उत्पत्ति की पृष्ठभूमि एवं कारण (Background & Causes)
- सामाजिक एवं आर्थिक पृष्ठभूमि: ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी में मध्य गंगा घाटी में लोहे के व्यापक प्रयोग, कृषि अधिशेष (Agriculture Surplus), व्यापार के विकास और द्वितीय नगरीकरण (Second Urbanization) के साथ सामाजिक संरचना में बदलाव आया।
- वैदिक कर्मकांडों का विरोध: पशु बलि, महंगे यज्ञों तथा ब्राह्मणवादी सामाजिक वर्चस्व और कठोर वर्ण व्यवस्था के खिलाफ असंतोष उत्पन्न हुआ।
- वैश्यों एवं व्यापारियों का समर्थन: नए नगरों के उदय और व्यापारिक समृद्धि से वैश्य वर्ग का प्रभाव बढ़ा, जिन्होंने कर्मकांड-मुक्त तथा अहिंसा पर आधारित सरल धर्मों को आर्थिक व सामाजिक प्रोत्साहन दिया।
(B) जैन धर्म (Jainism)
- तीर्थंकर एवं वर्धमान महावीर: जैन परंपरा प्राचीन है, जिसके 24वें तीर्थंकर वर्धमान महावीर (540–468 ईसा पूर्व/कुंडग्राम) थे, जिन्होंने केवल ज्ञान प्राप्त कर इस धर्म को सुसंगठित रूप दिया।
- मुख्य सिद्धांत:
- पंच महाव्रत: अहिंसा (मुख्य आधार), सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह (संग्रह न करना) और ब्रह्मचर्य।
- दर्शन: जैन धर्म द्वैतवादी व बहुलवादी है, जो आत्मा (जीव) और अजीव के शाश्वत अस्तित्व में विश्वास रखता है। इसके अनुसार केवल सजीवों में ही नहीं, बल्कि पत्थरों, जल और वायु जैसे निर्जीव पदार्थों में भी आत्मा विद्यमान है।
- स्याद्वाद और अनेकांतवाद: सत्य की बहुआयामी अभिव्यक्ति और आत्म-कठोरता (तपस्या) द्वारा कर्म बंधनों का क्षय।
- साहित्य एवं संप्रदाय: प्रारंभिक जैन आगम ग्रंथ अर्ध-मागधी प्राकृत में रचे गए। तीसरी शताब्दी ईस्वी के आसपास जैन संघ श्वेतांबर और दिगंबर दो संप्रदायों में विभाजित हो गया।
(C) बौद्ध धर्म (Buddhism)
- गौतम बुद्ध एवं जीवन: संस्थापक सिद्धार्थ गौतम (563–483 ईसा पूर्व/लुंबिनी) थे, जिन्होंने बोधगया में ज्ञान (संबोधि) प्राप्त किया तथा सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश (धर्मचक्रप्रवर्तन) दिया।
- मुख्य सिद्धांत:
- चार आर्य सत्य: संसार दुःखमय है, दुःख का कारण (तृष्णा) है, दुःख निरोध संभव है, और निरोध का मार्ग अष्टांगिक मार्ग है।
- मध्यम मार्ग (Middle Path): अत्यधिक विलास और अत्यधिक कठोर कायक्लेश के बीच का संतुलित मार्ग।
- अनात्मवाद: बौद्ध धर्म किसी शाश्वत स्थायी आत्मा (Anatta) के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता।
- साहित्य, संगीति एवं संप्रदाय: बौद्ध साहित्य मुख्यतः पाली भाषा में त्रिपिटक (विनय पिटक, सुत्त पिटक, अभिधम्म पिटक) के रूप में संकलित हुआ। कनिष्क के काल में चतुर्थ बौद्ध संगीति के बाद बौद्ध धर्म हीनयान (संस्कृत/पाली, मूर्ति पूजा रहित) और महायान (संस्कृत, बोधिसत्व व मूर्ति पूजा) में विभाजित हो गया।
2. मौर्य साम्राज्य (Mauryan Empire)
(A) राज्य प्रशासन और अर्थव्यवस्था (State Administration and Economy)
- केंद्रीय प्रशासन व सप्तांग सिद्धांत: मौर्य राज्य एक केंद्रीय राजतंत्र था जहाँ राजा सत्ता का केंद्र था। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य के सप्तांग सिद्धांत का वर्णन है, जिसके सात अंग हैं: स्वामी (राजा), अमात्य (मंत्री), जनपद (क्षेत्र व जनता), दुर्ग (किला), कोश (राजस्व), दंड/बल (सेना) और मित्र।
- प्रशासनिक अधिकारी: अर्थशास्त्र और अशोक के अभिलेखों में विभिन्न अधिकारियों का उल्लेख मिलता है:
- पण्याध्यक्ष: व्यापार एवं कीमतों पर नियंत्रण रखने वाला अधिकारी।
- संस्थाध्यक्ष: बाजारों का अधीक्षक।
- आकराध्यक्ष: खदानों व खान उद्योग का अध्यक्ष।
- रूपाध्यक्ष: सिक्कों और मुद्रा की जांच करने वाला निरीक्षक।
- समाहर्ता व पौर-व्यावहारिक: राजस्व संग्रहकर्ता तथा दीवानी व फौजदारी (धर्मस्थीय व कंटकशोधन) न्यायालयों के प्रमुख।
- प्रांतीय व्यवस्था: साम्राज्य चार प्रमुख प्रांतों में बंटा था—तक्षशिला (उत्तरी), उज्जैयिनी (पश्चिमी), सुवर्णगिरि (दक्षिणी) और तोसली (पूर्वी), जहाँ राजकुमारों (कुमार या आर्यपुत्र) को राज्यपाल नियुक्त किया जाता था।
- अर्थव्यवस्था एवं राजस्व: राज्य का कृषि, जंगलों, खदानों और व्यापार पर एकाधिकार व सख्त नियंत्रण था। मुख्य राजस्व उपज का 1/6 से 1/3 भाग भू-राजस्व के रूप में लिया जाता था। आयात-निर्यात पर शुल्क (चुंगी कर) लगाया जाता था तथा आपातकाल हेतु खाद्यान्न का बफ़र स्टॉक रखा जाता था।
(B) अशोक का धम्म: प्रकृति और प्रचार (Ashoka’s Dhamma: Nature and Propagation)
- धम्म की प्रकृति: अशोक का धम्म कोई नया धर्म या बौद्ध धर्म का प्रतिरूप नहीं था, बल्कि संपूर्ण साम्राज्य में शांति, नैतिक आचार और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए एक सार्वभौमिक नैतिक संहिता थी। कलिंग युद्ध के व्यापक विनाश के बाद अशोक ने भेरीघोष (सैन्य विजय) को त्यागकर धम्मघोष (नैतिक विजय) की नीति अपनाई।
- प्रमुख शिलालेख एवं धम्म के नियम:
- प्रथम बृहद शिलालेख: पशु बलि और अनावश्यक उत्सवों (समज) पर पूर्ण प्रतिबंध।
- द्वितीय शिलालेख: मनुष्य और पशुओं के लिए चिकित्सा व्यवस्था, सड़कों के किनारे कुएं खोदना व छायादार पेड़ लगाना।
- तृतीय व पंचम शिलालेख: माता-पिता, ब्राह्मणों व श्रमणों का आदर और शासन के 13वें वर्ष में धम्म महामात्र नामक नए अधिकारियों की नियुक्ति।
- सातवां व बारहवां शिलालेख: सभी धार्मिक संप्रदायों के बीच सहिष्णुता, आत्म-नियंत्रण और अंतर-धार्मिक सम्मान की अपील।
- तेरहवां शिलालेख: कलिंग युद्ध के विनाश का विवरण और धम्म विजय की श्रेष्ठता का उल्लेख।
- प्रचार के साधन: अशोक ने शिलालेखों (मागधी प्राकृत, ब्राह्मी, खरोष्ठी, यूनानी व अरामी लिपियों में) के माध्यम से संदेश फैलाया तथा श्रीलंका, मिस्र, सीरिया व ग्रीस में धम्म प्रचारक (दूतमंडल) भेजे।
3. उत्तर-मौर्य काल (Post-Mauryan Period)
(A) प्रमुख राजवंश (Sungas, Western Kshatrapas, Satavahanas, Kushanas)
- शुंग राजवंश (185–73 ईसा पूर्व): पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या कर मगध में शुंग वंश की स्थापना की। इन्होंने वैदिक धर्म को पुनर्जीवित किया और पतंजलि के महाभाष्य को संरक्षण दिया।
- पश्चिमी क्षत्रप (शक): मालवा और काठियावाड़ क्षेत्र पर शासन किया। इनमें रुद्रदामन प्रथम सबसे प्रसिद्ध शासक हुए, जिनका जूनागढ़ शिलालेख (संस्कृत काव्य शैली का प्रथम प्रामाणिक उदाहरण) उनकी विजयावलियों और सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार की जानकारी देता है।
- सातवाहन राजवंश (1st C. BCE – 3rd C. CE): दक्कन में सिमुक द्वारा स्थापित। महान शासक गौतमीपुत्र शातकर्णी ने शकों को पराजित कर साम्राज्य का विस्तार किया। उन्होंने ब्राह्मण धर्म को बढ़ावा देने के साथ-साथ बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त भूमि अनुदान (ब्राह्मदेय) देने की प्रथा शुरू की। राजा हाल ने प्राकृत में गाथासप्तशती की रचना की।
- कुषाण राजवंश: मध्य एशिया की युएझि जाति की शाखा, जिसके संस्थापक कुजुल कडफिसस थे। कनिष्क (78 ईस्वी – शक संवत के प्रवर्तक) सबसे प्रतापी राजा थे। उन्होंने चतुर्थ बौद्ध संगीति बुलाई तथा गांधार एवं मथुरा कला शैलियों को संरक्षण दिया।
(B) व्यापार और मुद्रा प्रणाली (Trade and Coinage)
- व्यापार एवं रेशम मार्ग (Silk Route): कुषाणों के काल में मध्य एशिया से गुजरने वाला रेशम मार्ग भारत से जुड़ा, जिससे चीन, रोम और भारत के बीच व्यापार बढ़ा। सातवाहनों के समय पश्चिमी तट पर कल्याणी व भड़ौच और पूर्वी तट पर गंजाम प्रमुख बंदरगाह थे।
- मुद्रा प्रणाली का विकास:
- हिंद-यूनानियों (Indo-Greeks) ने भारत में सर्वप्रथम सिक्के जारी किए जिन पर राजाओं के नाम और चित्र उकेरे गए थे।
- कुषाणों ने बड़े पैमाने पर उच्च शुद्धता वाले स्वर्ण सिक्के और तांबे के सिक्के जारी किए।
- सातवाहनों ने मुख्य रूप से सीसा (Lead), पोटिन, तांबा, कांस्य और चांदी के सिक्के (कार्षापण) चलाए।
(C) संगम साहित्य में प्रतिबिंबित संस्कृति (Culture Reflected in Sangam Literature)
- संगम साहित्य की अवधारणा: दक्षिण भारत (तमिलकम) में पांड्य राजाओं के संरक्षण में आयोजित कवि गोष्ठियों (संगम) में रचित तमिल साहित्य। इसमें तोलकाप्पियम (व्याकरण ग्रंथ), पट्टुप्पाट्टु, एट्टुत्तोगै तथा सिलप्पादिकारम एवं मणिमेकलै जैसे महाकाव्य शामिल हैं।
- राजनीति और समाज: दक्षिण भारत में तीन राजवंशों—चोल, चेर और पांड्य का शासन था। समाज में वर्ण व्यवस्था का प्रभाव कम था; किसान, व्यापारी और योद्धा वर्ग मुख्य अंग थे।
- धर्म और विदेशी व्यापार: प्राथमिक देवता सेयोन (मुरुगन) थे। अरिकामेडु और पूमपुहार जैसे बंदरगाहों से रोम साम्राज्य के साथ समृद्ध समुद्री व्यापार होता था, जिसके प्रमाण यहाँ से मिले विशाल रोमन स्वर्ण सिक्कों से मिलते हैं।
4. गुप्तों का इतिहास (History of the Guptas)
(A) श्रीगुप्त से स्कंदगुप्त तक कालानुक्रम (Chronology from Srigupta to Skandgupta)
- श्रीगुप्त एवं घटोत्कच (c. 275–319 CE): गुप्त वंश के प्रारंभिक शासक जिन्होंने ‘महाराज’ की उपाधि धारण की।
- चंद्रगुप्त प्रथम (319–335 CE): गुप्त साम्राज्य के वास्तविक संस्थापक। इन्होंने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि ली, लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया और 319-320 ईस्वी में गुप्त संवत चलाया।
- समुद्रगुप्त (335–380 CE): ‘भारत का नेपोलियन’ कहे जाने वाले महान विजेता। हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग प्रशस्ति में उनकी आर्यावर्त (उत्तर भारत) और दक्षिणापथ अभियानों की विजयावलियों का उल्लेख है।
- चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ (380–415 CE): पश्चिमी भारत के शक क्षत्रप रुद्रसिंह तृतीय को पराजित कर मालवा व गुजरात को साम्राज्य में मिलाया। इनके दरबार में नवरत्न (कालिदास, वराहमिहिर आदि) थे और चीनी यात्री फाह्यान ने इनके काल में भारत की यात्रा की।
- कुमारगुप्त प्रथम (415–455 CE): इन्होंने विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की।
- स्कंदगुप्त (455–467 CE): मध्य एशिया से हुए बर्बर हूण आक्रमणकारियों को पराजित कर भारत की रक्षा की तथा गिरनार की सुदर्शन झील का पुनरुद्धार करवाया।
(B) प्रशासनिक व्यवस्था (Administration)
- केंद्रीय व प्रांतीय प्रशासन: राजा सर्वोच्च प्रशासक व सेनापति था, जिसने ‘परमभट्टारक’ और ‘महाराजाधिराज’ जैसी उपाधियां लीं। साम्राज्य प्रांतों में विभाजित था जिन्हें भुक्ति (राज्यपाल: उपरिक) कहा जाता था। भुक्तियाँ जिलों में बंटी थीं जिन्हें विषय (प्रमुख: विषयपति) कहते थे।
- स्थानीय व ग्राम प्रशासन: प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी जिसका प्रमुख ग्रामिक होता था। नगरों के प्रशासन में नगर-श्रेष्ठियों और शिल्पियों की परिषदों का सीधा योगदान था।
(C) कृषि और राजस्व प्रणाली (Agrarian and Revenue Systems)
- भूमि के प्रकार: अभिलेखों और अमरकोश में भूमि के प्रकार बताए गए हैं—क्षेत्र (कृषि योग्य), खिल (बंजर), अप्रहत (जंगली), गोपत सरह (चारागाह) और वास्तु (आवासीय)। भूमि मापने के लिए कुल्यावाप और द्रोणवाप इकाइयों का प्रयोग होता था।
- राजस्व प्रणाली: भू-राजस्व (भाग) उत्पादन का 1/6 भाग होता था। अन्य करों में भोग (फल-फूल का उपहार), उद्रंग (स्थायी कृषकों पर कर), उपरिकर, हिरण्य (नकद कर) और विष्टि (बेगार श्रम) शामिल थे।
(D) अर्थव्यवस्था, समाज और साहित्य (Economy, Society, and Literature)
- अर्थव्यवस्था व मुद्रा: व्यापारिक गतिविधियों का संचालन श्रेणियों (Guilds) द्वारा किया जाता था। गुप्त राजाओं ने प्रचुर मात्रा में कलात्मक स्वर्ण सिक्के जारी किए जिन्हें ‘दीनार’ कहा जाता था।
- समाज: वर्ण व्यवस्था सुदृढ़ हुई और कई नई जातियां (जैसे कायस्थ) अस्तित्व में आईं।
- साहित्य एवं कला (स्वर्ण युग): संस्कृत राजभाषा बनी। कालिदास की रचनाएं (अभिज्ञानशाकुंतलम्, मेघदूतम्), विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, शूद्रक का मृच्छकटिकम् और आर्यभट्ट व वराहमिहिर के गणित व खगोलशास्त्र में योगदान के कारण गुप्त काल को भारत का ‘स्वर्ण युग’ (Golden Age) कहा जाता है।
5. उत्तर-गुप्त काल (Post-Gupta Period)
(A) पल्लव, चालुक्य और वर्धन राजवंश (Pallavas, Chalukyas, and Vardhan Dynasties)
- वर्धन (पुष्यभूति) राजवंश (थानेश्वर व कन्नौज):
- संस्थापक पुष्यभूति थे; प्रभाकरवर्धन प्रथम प्रमुख राजा हुए।
- सबसे महान शासक हर्षवर्धन (606–647 CE) थे। उन्होंने अपनी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानांतरित की।
- बाणभट्ट ने हर्षचरित की रचना की तथा चीनी यात्री ह्वेनसांग (सी-यू-की का लेखक) ने हर्ष के काल का विवरण दिया। हर्ष ने स्वयं संस्कृत में तीन नाटक लिखे—नागानंद, प्रियदर्शिका और रत्नावली।
- बादामी के चालुक्य राजवंश (दक्कन):
- प्रथम चालुक्य शासक पुलकेशिन प्रथम थे। सबसे प्रसिद्ध राजा पुलकेशिन द्वितीय (608–642 CE) थे।
- नर्मदा नदी के तट पर हुए युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय ने हर्षवर्धन के दक्षिण अभियान को विफल कर दिया, जिसके बाद उन्होंने ‘सकलोत्तरपथनाथ’ का दर्जा पाया। रविकीर्ति द्वारा रचित ऐहोल अभिलेख में उनकी विजयों का उल्लेख है।
- चालुक्यों ने वेसर शैली (Vesara style) और ऐहोल, बादामी व पट्टदकल के मंदिरों का निर्माण कराया।
- कांची के पल्लव राजवंश (दक्षिण भारत):
- संस्थापक सिंहविष्णु थे तथा राजधानी कांचीपुरम थी।
- प्रमुख राजा महेंद्रवर्मन प्रथम (जिन्होंने मत्तविलास प्रहसन लिखा) और नरसिंहवर्मन प्रथम ‘मामल्ल’ थे। नरसिंहवर्मन प्रथम ने पुलकेशिन द्वितीय को हराकर ‘वातापीकोंड’ की उपाधि ली और महाबलीपुरम के प्रसिद्ध एकश्म रथ मंदिरों का निर्माण कराया।
- चालुक्य-पल्लव संघर्ष: दक्कन और दक्षिण भारत के बीच कृष्णा-तुंगभद्रा दोआब के उपजाऊ क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए चालुक्यों और पल्लवों के मध्य सदियों तक संघर्ष चला।