प्राचीन भारतीय इतिहास: इकाई 1

प्राचीन भारतीय इतिहास: इकाई 1


1. भारतीय उपमहाद्वीप: भौगोलिक परिदृश्य और पर्यावरण (Indian Sub-continental, Geographical Landscape and Environment)

  • परिभाषा एवं भू-राजनीतिक संदर्भ: भारतीय उपमहाद्वीप एशिया का एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र है, जो उत्तर में विशाल हिमालय पर्वतमाला से और शेष तीनों तरफ हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से घिरा हुआ है। वर्तमान में इसमें मुख्य रूप से भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव शामिल हैं।
  • भूवैज्ञानिक उत्पत्ति: लगभग 40-50 मिलियन वर्ष पूर्व प्रायद्वीपीय भारत मूल रूप से प्राचीन गोंडवानालैंड महाद्वीप का भाग था। विवर्तनिक (Tectonic) गतिविधियों के कारण यह उत्तर की ओर प्रवाहित होकर यूरेशियाई महाद्वीप से टकराया, जिससे हिमालय का उत्थान हुआ।
  • भौगोलिक क्षेत्र एवं पर्यावरण:
    • हिमालय पर्वतमाला: यह उत्तर में एक प्राकृतिक दीवार की तरह कार्य करती है। यह साइबेरिया से आने वाली ठंडी ध्रुवीय हवाओं से रक्षा करती है तथा दक्षिण-पश्चिम मानसून को रोककर उपमहाद्वीप में वर्षा कराती है। उत्तर-पश्चिम में स्थित खैबर, बोलन और गोमल दर्रों ने प्राचीन काल से ही मध्य एवं पश्चिम एशिया के साथ व्यापारिक तथा सांस्कृतिक संपर्कों का मार्ग प्रशस्त किया।
    • उत्तरी मैदान (इंडो-गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन): सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाई गई उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी से निर्मित यह मैदान प्राचीन सभ्यताओं और नगरों का केंद्र रहा है।
    • प्रायद्वीपीय पठार: विंध्य एवं सतपुड़ा पर्वतमालाएं उत्तरी भारत को दक्षिण भारत (दक्कन) से अलग करती हैं। दक्कन का पठार प्राचीन ज्वालामुखी लावा के प्रवाह से निर्मित एक स्थिर भूवैज्ञानिक संरचना है।
  • मानसून की भूमिका: दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-अक्टूबर) कृषि (विशेषकर खरीफ फसल) का मुख्य आधार रहा है, जबकि उत्तर-पूर्व मानसून तटीय क्षेत्रों में वर्षा लाता है। प्रथम शताब्दी ईस्वी के आसपास मानसून हवाओं के ज्ञान ने समुद्री व्यापार को अत्यंत सुगम बनाया।

2. प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत (Sources of Ancient Indian History)

प्राचीन भारत के इतिहास के पुनर्गठन के लिए स्रोतों को मुख्यतः दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है: साहित्यिक स्रोत और पुरातात्विक स्रोत

(A) साहित्यिक स्रोत (Literary Sources)

  1. ब्राह्मण/वैदिक साहित्य:
    • वेद (श्रुति ग्रंथ): ऋग्वेद (सबसे प्राचीन, 10 मंडल व 1028 सूक्त), सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद।
    • सहायक ग्रंथ: ब्राह्मण ग्रंथ (यज्ञीय विधियों हेतु), आरण्यक, उपनिषद (आध्यात्मिक ज्ञान, कुल 108 उपनिषद), वेदांग और स्मृतियां (जैसे मनुस्मृति, नारदस्मृति)।
    • महाकाव्य व पुराण: रामायण, महाभारत तथा 18 पुराण (जो प्राचीन राजवंशों की वंशावली प्रदान करते हैं)।
  2. बौद्ध एवं जैन साहित्य:
    • बौद्ध ग्रंथ: त्रिपिटक (विनय पिटक, सुत्त पिटक, अभिधम्म पिटक) तथा बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएं (जातक कथाएं)।
    • जैन ग्रंथ: आगम ग्रंथ, परिशिष्टपर्वन तथा भगवती सूत्र (जिसमें 16 महाजनपदों का उल्लेख है)।
  3. धर्मनिरपेक्ष एवं ऐतिहासिक ग्रंथ: कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ (मौर्यकालीन शासन व्यवस्था का प्रथम प्रामाणिक ग्रंथ), विशाखदत्त का ‘मुद्राराक्षस’, और कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ (कश्मीर का संस्कृत में ऐतिहासिक इतिहास)।
  4. विदेशी यात्रियों के विवरण: यूनानी राजदूत मेगस्थनीज की ‘इंडिका’, चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग (जिसकी पुस्तक ‘सी-यू-की’ है) के यात्रा वृत्तांत।

(B) पुरातात्विक स्रोत (Archaeological Sources)

  • अभिलेख (Epigraphy): शिलालेख, स्तंभलेख, ताम्रपत्र व गुहालेख (जैसे अशोक के शिलालेख, समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति)। अभिलेख इतिहास के सर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत माने जाते हैं।
  • सिक्के (Numismatics): सिक्के साम्राज्य की आर्थिक स्थिति, व्यापारिक सीमाओं और तिथियों का ज्ञान कराते हैं।
  • स्मारक, मूर्तियां व मृदभांड: हड़प्पा की मुहरें, मौर्य व गुप्तकालीन स्थापत्य एवं चित्रकला के अवशेष जो तत्कालीन कला और समाज पर प्रकाश डालते हैं।

3. पुरापाषाण काल की संस्कृति: अनुक्रम, वितरण एवं उपकरणों के प्रकार (Palaeolithic Culture: Sequence, Distribution, Tools Typology)

पुरापाषाण काल मानव इतिहास का सबसे लंबा चरण है, जो मुख्य रूप से शिकारी-संग्राहक (Hunter-Gatherer) जीवन शैली पर आधारित था। इसे उपकरणों की तकनीक के आधार पर तीन अनुक्रमों में बांटा जाता है:

  1. निम्न पुरापाषाण काल (Lower Palaeolithic Culture):
    • उपकरणों के प्रकार: क्वार्टजाइट पत्थरों से बने पेबुल उपकरण जैसे गंडासा (Chopper), खंडक (Chopping), और हस्त-कुल्हाड़ी (Handaxe)
    • वितरण/स्थल: सोहन नदी घाटी (पंजाब, पाकिस्तान), बेलन घाटी (उत्तर प्रदेश), नर्मदा घाटी, डिडवाना (राजस्थान) और अत्तिरमपक्कम (तमिलनाडु)।
  2. मध्य पुरापाषाण काल (Middle Palaeolithic Culture):
    • उपकरणों के प्रकार: इसे ‘फलक संस्कृति’ (Flake Industry) कहा जाता है। कोर पत्थरों से निकाले गए शल्कों से खुरचनी (Scrapers), वेधक (Borers) और तीर के सिरे (Points) बनाए गए। इसके लिए एगेट, जैस्पर और चेल्सीडोनी जैसे बारीक पत्थरों का उपयोग हुआ। महाराष्ट्र के नेवासा स्थल के आधार पर इसे ‘नेवासियन उद्योग’ भी कहा जाता है।
    • वितरण/स्थल: नर्मदा नदी घाटी, तुंगभद्रा नदी घाटी, भीमबेटका और सिंध की रोहरी पहाड़ियाँ।
  3. उच्च पुरापाषाण काल (Upper Palaeolithic Culture):
    • उपकरणों के प्रकार: ब्लेड (Blades) और तक्षणी (Burins) तकनीक का विकास हुआ। पत्थरों के साथ-साथ हड्डियों और सींगों के औजार भी बनाए जाने लगे।
    • वितरण/स्थल: आंध्र प्रदेश (रेनिगुंटा), कर्नाटक, केंद्रीय मध्य प्रदेश, दक्षिणी उत्तर प्रदेश और छोटानागपुर पठार।

4. मध्यपाषाण काल की संस्कृति: तकनीक में नए विकास (Mesolithic Culture: New Development in Technology)

मध्यपाषाण काल पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल के बीच का एक संक्रमणकालीन चरण है, जो होलोसीन युग के प्रारंभ (लगभग 10,000 वर्ष पूर्व) से संबंधित है।

  • तकनीकी विकास (Microliths): इस काल की सबसे बड़ी विशेषता अत्यंत छोटे और परिष्कृत पत्थर के औजारों का विकास है, जिन्हें सूक्ष्मपाषाण (Microliths) कहा जाता है।
    • ये उपकरण 1 से 5 सेमी लंबे होते थे, जिनमें ज्यामितीय आकृतियां (जैसे त्रिकोण, समलंब, चंद्राकार) और अज्यामितीय आकृतियां शामिल थीं।
    • इन माइक्रोलिथ्स को लकड़ी या हड्डी के हत्थों में सांचे की तरह जोड़कर बाण (Arrows), भाले और हंसिया (Sickles) बनाए जाते थे, जिससे प्रक्षेपास्त्र तकनीक (Projectiles) का विकास हुआ।
  • जीवन शैली एवं अर्थव्यवस्था: शिकार और खाद्य संग्रह के साथ-साथ मानव ने पशुपालन की दिशा में शुरुआती कदम बढ़ाए।
  • प्रमुख स्थल: बागोर (राजस्थान – पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य), लंगनाज (गुजरात), भीमबेटका (मध्य प्रदेश), सराय नाहर राय और महदहा (उत्तर प्रदेश)।
  • कला व शवाधान: भीमबेटका की शैलकला (Rock Art) से उनके सामाजिक जीवन और सौंदर्यबोध का पता चलता है। मृतकों को कब्रों में सीधा या घुटना मोड़कर दफनाया जाता था और कब्रों में शवाधान सामग्रियां (जैसे मांस के टुकड़े, हड्डी के आभूषण) रखी जाती थीं।

5. नवपाषाण काल की संस्कृति की अवधारणा: प्रकार, शवाधान प्रथाएं (Concept of Neolithic Culture: Type, Funerary Practice)

  • अवधारणा: नवपाषाण काल (Neolithic Age) मानव इतिहास में ‘खाद्य उत्पादन’ (Food Production) की शुरुआत, कृषि का प्रारंभ, पशुपालन, स्थायी ग्रामीण बस्तियों का निर्माण, चाक पर निर्मित मृदभांड और पॉलिशदार पत्थर की कुल्हाड़ियों (Polished Stone Axes) के उपयोग की क्रांति का प्रतीक है।

नवपाषाण संस्कृतियों के क्षेत्र व प्रकार (Regional Types)

  1. उत्तरी क्षेत्र (कश्मीर घाटी): बुर्जहोम और गुफकराल प्रमुख स्थल हैं। बुर्जहोम अपनी गर्तावास (Pit-dwellings) यानी जमीन के अंदर बने मिट्टी के गड्ढे वाले मकानों के लिए प्रसिद्ध है।
  2. विंध्य एवं गंगा घाटी क्षेत्र: कोल्दिहवा और महगड़ा (उत्तर प्रदेश), जहाँ से विश्व में धान/चावल की खेती के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं।
  3. पूर्वी भारत: चिरांद (बिहार), जो हिरण के सींगों से बने प्रचुर मात्रा में हड्डी के औजारों के लिए जाना जाता है।
  4. दक्षिण भारत: संगनकल्लू, पिकलीहल, उत्नूर, हलूर और पलावॉय। यहाँ मवेशी रखने वाले चरवाहों द्वारा छोड़े गए गोबर के ढेर से बने ‘राख के टीले’ (Ash-mounds) मिले हैं।

शवाधान (अंतिम संस्कार) की प्रथाएं (Funerary Practices)

  • बुर्जहोम (कश्मीर): प्राथमिक व द्वितीयक दोनों प्रकार के शवाधान मिले हैं। यहाँ मनुष्यों को चूने का प्लास्टर लगे गोल गड्ढों में दफनाया जाता था। बुर्जहोम की एक अनूठी प्रथा मालिक के साथ उनके पालतू कुत्तों को कब्र में दफनाना थी। इसके अलावा, अंशकालिक शवाधानों में हड्डियों पर लाल गेरू (Red Ochre) लेपने के प्रमाण मिले हैं।
  • दक्षिण भारत एवं मध्य भारत: यहाँ गर्त शवाधान (Pit Burials) तथा कलश शवाधान (Urn Burials) की प्रथा प्रचलित थी। शिशुओं और बच्चों के शवों को मिट्टी के मटकों/कलशों (Urns) में रखकर घरों के फर्श के नीचे या आवासीय क्षेत्र के पास दफनाया जाता था।

6. हड़प्पा सभ्यता: उत्पत्ति, विस्तार, नगर नियोजन, आर्थिक संगठन, कला और वास्तुकला (Harappan Civilization: Origin, Extent, Town Planning, Economic Organizations, Art and Architecture)

(A) उत्पत्ति एवं विकास (Origin)

हड़प्पा सभ्यता का उद्भव किसी बाहरी मेसोपोटामियाई विसरण (Diffusion) का परिणाम नहीं था। पुरातात्विक अनुसंधानों से सिद्ध हुआ है कि इसका विकास बलूचिस्तान व सिंधु क्षेत्र की स्थानीय प्राक्-हड़प्पा ग्रामीण ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों (जैसे मेहरगढ़, सोथी, अमरी, कोटदीजी) से क्रमिक रूप से हुआ था।

(B) भौगोलिक विस्तार (Extent)

यह सभ्यता उत्तर में मांडा (जम्मू-कश्मीर), दक्षिण में दैमाबाद (महाराष्ट्र), पूर्व में आलमगीरपुर (उत्तर प्रदेश) और पश्चिम में सुतकागेंडोर (पाकिस्तान-ईरान सीमा) तक फैली हुई थी। अफ़गानिस्तान में शोरतुघई इसका एक प्रमुख व्यापारिक स्थल था।

(C) नगर नियोजन (Town Planning)

  • जाल/ग्रिड प्रणाली: नगरों की सड़कें एवं गलियां एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं, जिससे नगर आयताकार खंडों में विभक्त हो जाते थे।
  • द्वि-स्तरीय विभाजन: नगर मुख्य रूप से दो भागों में बंटे थे—पश्चिम में एक ऊँचे टीले पर स्थित दुर्ग/गढ़ (Citadel) (जहाँ प्रशासनिक इमारतें व शासक वर्ग रहता था) और पूर्व में निचला शहर (Lower Town) (जहाँ सामान्य नागरिक रहते थे)।
  • भवन व जल निकासी: मकान पक्की ईंटों (मानक अनुपात 4:2:1) के बने होते थे। मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार (Great Bath) और विशाल अन्नागार (Granaries) वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं। सड़कों के किनारे ढकी हुई नालियाँ और गंदे पानी के निकास की अद्भुत सफाई व्यवस्था थी।

(D) आर्थिक संगठन (Economic Organizations)

  • कृषि व पशुपालन: उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी पर आधारित कृषि में गेहूं, जौ, राय, तिल और कपास (सइंडन) की उपज होती थी। बैल, भैंस, भेड़-बकरी और ऊंट पाले जाते थे।
  • शिल्प एवं व्यापार: मनके बनाने का उद्योग (चन्हूदड़ों व लोथल), धातु विज्ञान (कांसा, तांबा, सोना, चांदी), मुहर निर्माण और वस्त्र बुनाई अत्यंत विकसित थे। आंतरिक व्यापार के साथ-साथ मेसोपोटामिया (मेलुहा) और फ़ारस की खाड़ी के देशों के साथ समृद्ध समुद्री व थल व्यापार होता था।

(E) कला और वास्तुकला (Art and Architecture)

  • धातु कला: मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांस्य की प्रसिद्ध नर्तकी की मूर्ति (Dancing Girl) लुप्त-मोम विधि (Lost-wax casting) का बेहतरीन उदाहरण है।
  • पाषाण एवं मृण्मूर्तियाँ: मोहनजोदड़ो से प्राप्त चूना-पत्थर की दाढ़ी वाले ‘पुजारी-राजा’ (Bearded Priest) की मूर्ति तथा प्रचुर मात्रा में मिली मातृदेवी की पकी मिट्टी की मूर्तियां (Terracotta figurines)।
  • मुहरें (Seals): सेलखड़ी (Steatite) से बनी वर्गाकार मुहरें जिन पर एकशृंगी (Unicorn), कुबड़वाला बैल और पशुपति शिव की आकृति उकेरी गई है।

7. वैदिक साहित्य में प्रतिबिंबित संस्कृति: राजव्यवस्था, धर्म और अर्थव्यवस्था (Culture Reflected in Vedic Literature: Polity, Religion and Economy)

वैदिक संस्कृति को दो स्पष्ट कालखंडों में समझा जाता है: ऋग्वैदिक काल (c. 1500–1000 BCE) और उत्तर वैदिक काल (c. 1000–500 BCE)।

(A) राजव्यवस्था (Polity)

  • ऋग्वैदिक काल: राजनीतिक ढांचा कबीलाई था। कबीले को ‘विश’ या ‘जन’ कहा जाता था और उसके प्रमुख को राजन् (राजा) कहते थे। राजा की शक्तियों पर सभा, समिति और वि his/दथ जैसी कबीलाई सभाओं का नियंत्रण होता था। युद्ध क्षेत्रीय विस्तार के लिए नहीं बल्कि मवेशियों (गायों की खोज – ‘गविष्टि’) के लिए लड़े जाते थे।
  • उत्तर वैदिक काल: कबीलों के विलय से ‘राष्ट्र’ की अवधारणा और क्षेत्रीय राज्यों (जैसे कुरु, पांचाल) का उदय हुआ। राजा की शक्तियां बढ़ीं, पद आनुवंशिक हो गया तथा सभा एवं समिति का प्रभाव कम हो गया। राजा की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए राजसूय, अश्वमेध और वाजपेय जैसे विशाल यज्ञ किए जाने लगे।

(B) धर्म एवं दर्शन (Religion)

  • ऋग्वैदिक काल: प्रकृति की शक्तियों का मानवीकरण करके देव पूजा की जाती थी (Naturalistic Polytheism)। इंद्र (युद्ध व वर्षा के देवता – 250 सूक्त), अग्नि (ईश्वर व मनुष्य के बीच मध्यस्थ) और वरुण (ऋत यानी नैतिक व्यवस्था के संरक्षक) प्रमुख देवता थे। प्रार्थनाएँ और सरल यज्ञीय बलि धर्म के मुख्य अंग थे।
  • उत्तर वैदिक काल: ऋग्वैदिक देवताओं का स्थान प्रजापति (सृष्टिकर्ता), रुद्र और विष्णु ने ले लिया। धार्मिक कर्मकांड अत्यंत जटिल, महंगे और पशु बलि से युक्त हो गए, जिसके विरोध स्वरूप उपनिषदों में ब्रह्म, आत्मा और मोक्ष के दर्शन का विकास हुआ।

(C) अर्थव्यवस्था (Economy)

  • ऋग्वैदिक काल: यह मुख्यतः एक पशुपालक अर्थव्यवस्था (Pastoral Economy) थी, जहाँ गायें संपत्ति का मुख्य मापदंड (गोमत) और विनिमय का साधन थीं। कृषि गौण व्यवसाय था। भूमि पर व्यक्तिगत स्वामित्व नहीं बल्कि कबीले का अधिकार था। नियमित कर प्रणाली नहीं थी; लोग स्वेच्छा से ‘बलि’ (उपहार) देते थे।
  • उत्तर वैदिक काल: लोहे (कृष्ण अयस) के उपयोग से जंगलों की कटाई हुई और स्थायी कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बन गई। गेहूं (गोधूम), जौ (यव) और चावल (व्रीहि) की खेती होने लगी। चार वर्णों की सामाजिक व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) सुदृढ़ हुई।

8. लौह युग की संस्कृति: उत्तर भारत एवं दक्कन की महापाषाणिक संस्कृति तथा क्षेत्रीय राज्यों का उदय (Iron Age Culture: Megalithic North and Deccan, Rise of Territorial State)

(A) उत्तर भारत एवं दक्कन की महापाषाणिक संस्कृति (Megalithic Culture)

  • अर्थ एवं संकल्पना: ‘मेगालिथ’ (Megalith) शब्द ग्रीक भाषा के ‘मेगास’ (बड़ा) और ‘लिथोस’ (पत्थर) से बना है। ये बड़े, अनगढ़ पत्थरों से बनी वे संरचनाएं हैं जो मुख्य रूप से शवाधानों (समाधियों) या स्मारक स्तंभों के रूप में बनाई जाती थीं।
  • लौह युग से संबंध: दक्षिण भारत, दक्कन, विंध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में लौह तकनीक की शुरुआत महापाषाण संस्कृति से जुड़ी हुई है।
  • मुख्य प्रकार:
    • शिस्ट (Cist / डोलमेन): पत्थरों की पट्टियों से बना भूमिगत या अर्ध-भूमिगत पत्थर का बक्सा।
    • केर्न सर्कल (Cairn Circle) व स्टोन सर्कल: कब्र के चारों ओर गोल पत्थरों का घेरा।
    • मेनहिर (Menhir): मृतक की स्मृति में गाड़ा गया विशाल अकेला पत्थर का खंभा।
  • सामग्री व विशेषताएं: इन कब्रों में काले और लाल मृदभांड (Black and Red Ware – BRW), लोहे के उपकरण (तलवारें, भाले, कुल्हाड़ियाँ, दरांती) तथा घोड़े के अवशेष व साज़-सामान मिले हैं, जो एक योद्धा वर्ग की उपस्थिति की ओर इशारा करते हैं। जूनापानी, माहुरझारी (नागपुर), खापा, ब्रह्मगिरि, हलूर और अदिचन्नल्लूर इसके प्रमुख स्थल हैं।

(B) क्षेत्रीय राज्यों एवं महाजनपदों का उदय (Rise of Territorial States)

  • द्वितीय नगरीकरण (Second Urbanization): लगभग 600 ईसा पूर्व के आसपास मध्य गंगा घाटी में लोहे के उपकरणों के व्यापक प्रयोग, सघन कृषि और अधिशेष अन्न उत्पादन से बस्तियों का आकार बढ़ा और शहरों का विकास हुआ। इसे भारत की ‘द्वितीय नगरीकरण की क्रांति’ कहा जाता है।
  • NBPW संस्कृति: इस काल की पहचान उत्तरी काले पॉलिशदार मृदभांड (Northern Black Polished Ware – NBPW) से है।
  • 16 महाजनपद (Sixteen Mahajanapadas): बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय और जैन ग्रंथ भगवती सूत्र के अनुसार 16 बड़े क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इनमें काशी, कोसल, अंग, मगध, वज्जि, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवंती, गांधार और कंबोज शामिल थे।
  • मगध का उत्कर्ष: उपजाऊ गंगा मैदान, समृद्ध लोहे की खदानों, व्यापारिक जलमार्गों और योग्य शासकों के कारण मगध अन्य राज्यों को पछाड़कर प्रथम शक्तिशाली क्षेत्रीय साम्राज्य के रूप में स्थापित हुआ।

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