कक्षा 11 अर्थशास्त्र अध्याय 7 पर्यावरण और धारणीय विकास
📘 कक्षा 11 अर्थशास्त्र – अध्याय 7: पर्यावरण और धारणीय विकास (Notes)
1. पर्यावरण: परिभाषा एवं घटक (Environment: Definition & Components)
- पर्यावरण का अर्थ: पर्यावरण को समस्त भूमंडलीय विरासत और सभी संसाधनों की समग्रता के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसमें वे सभी जैविक और अजैविक घटक शामिल हैं जो एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
- जैविक घटक (Biotic Components): सभी जीवित तत्व जैसे—पक्षी, पशु, पौधे, वन, मत्स्य आदि।
- अजैविक घटक (Abiotic Components): सभी निर्जीव तत्व जैसे—हवा, पानी, भूमि, चट्टानें और सूर्य की किरणें।
2. पर्यावरण के मुख्य कार्य (Functions of Environment)
पर्यावरण चार आवश्यक कार्य निष्पादित करता है:
- संसाधनों की पूर्ति करना: यह उत्पादन के लिए संसाधन प्रदान करता है।
- नवीकरण-योग्य संसाधन (Renewable Resources): जिनका उपयोग संसाधन के समाप्त होने के जोखिम के बिना निरंतर किया जा सकता है (जैसे—वन के पेड़, मछलियाँ)।
- गैर-नवीकरण योग्य संसाधन (Non-renewable Resources): जो निष्कर्षण और उपयोग से समाप्त हो जाते हैं (जैसे—जीवाश्म ईंधन/कोयला/पेट्रोलियम)।
- अपशिष्टों को समाहित करना (Waste Assimilation): यह उत्पादन व उपभोग से उत्पन्न अवशेषों और कचरे को सोखता है।
- जीवन का पोषण करना: यह आनुवंशिक और जैविक विविधता प्रदान करके जीवन को बनाए रखता है।
- सौंदर्य विषयक सेवाएँ देना: यह प्राकृतिक सौंदर्य (जैसे सुंदर दृश्य) प्रदान करता है।
3. पर्यावरण संकट: कारण एवं अवधारणाएँ (Environmental Crisis)
- धारण क्षमता (Carrying Capacity): पर्यावरण बिना किसी संकट के कार्य तब तक कर सकता है जब तक मांग उसकी धारण क्षमता की सीमा में हो। इसके दो मुख्य पहलू हैं:
- संसाधनों का निष्कर्षण उनके पुनर्जन्म (पुनर्सृजन) की दर से अधिक न हो।
- उत्पन्न अपशिष्ट पर्यावरण की अवशोषण क्षमता (Absorbing Capacity) के भीतर हो।
- अवशोषण क्षमता: पर्यावरण द्वारा अपशिष्ट एवं क्षय को सोखने/सहन करने की क्षमता।
- पर्यावरण संकट का कारण: जब जनसंख्या विस्फोट, औद्योगिक क्रांति और अत्यधिक उपभोग के कारण संसाधनों की मांग उनके पुनर्सृजन की दर से अधिक हो जाती है और अपशिष्ट अवशोषण क्षमता से बाहर हो जाता है, तब पर्यावरण संकट उत्पन्न होता है।
4. प्रमुख वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दे (Global Environmental Issues)
(A) वैश्विक उष्णता / ग्लोबल वॉर्मिंग (Global Warming)
- अर्थ: पृथ्वी और समुद्र के वातावरण के औसत तापमान में क्रमिक वृद्धि।
- कारण: मानव गतिविधियों द्वारा वनविनाश और जीवाश्म ईंधन के जलने से ग्रीनहाउस गैसों (कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, ओजोन) के वायुमंडलीय संकेंद्रण में वृद्धि।
- दुष्परिणाम: ध्रुवीय बर्फ का पिघलना, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, बाढ़ का प्रकोप, चक्रवातों की बारंबारता और प्रजातियों का विलुप्त होना।
- क्योटो प्रोटोकॉल (1997): वैश्विक उष्णता का सामना करने के लिए क्योटो (जापान) में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय समझौता हुआ, जिसमें औद्योगिकीकृत राष्ट्रों से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी की मांग की गई।
(B) ओजोन क्षय (Ozone Depletion)
- अर्थ: समतापमंडल (Stratosphere) में ओजोन गैस की परत का पतला होना या उसकी मात्रा में कमी।
- कारण: समतापमंडल में क्लोरीन और ब्रोमीन के उच्च स्तर, जो मुख्य रूप से क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) (रेफ्रिजरेटर, एसी, एरोसोल प्रोपेलेंट्स) और ब्रोमोफ्लोरोकार्बन से उत्पन्न होते हैं।
- दुष्परिणाम: पराबैंगनी (UV) विकिरण का पृथ्वी तक पहुँचना, जिससे मनुष्यों में त्वचा कैंसर, फाइटोप्लांकटन (जलीय जीव-पौधे) और स्थलीय पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल: ओजोन क्षयकारी रसायनों (CFCs, कार्बन टेट्राक्लोराइड, हैलोन आदि) के प्रयोग पर रोक लगाने हेतु अपनाया गया अंतर्राष्ट्रीय समझौता।
5. भारत में पर्यावरण की स्थिति एवं चुनौतियाँ (Environmental State in India)
- प्राकृतिक प्रचुरता: भारत में समृद्ध प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं—दक्षिण के पठार की काली मिट्टी (कपास की खेती हेतु), गंगा का उपजाऊ मैदान, प्रचुर वन, और विश्व के कुल लौह-अयस्क भंडार का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा।
- दोहरा पर्यावरणीय संकट (Two-fold Environmental Threat):
- निर्धनता-जनित पर्यावरण क्षय: गरीबी के कारण वनों की अवैध कटाई, जलाऊ लकड़ी पर निर्भरता और भूमि का अति-उपयोग।
- समृद्धि एवं औद्योगिकीकरण से प्रदूषण: तीव्र औद्योगिक विकास, शहरीकरण और वाहनों के बढ़ते घनत्व से उत्पन्न वायु, जल व मृदा प्रदूषण।
- भूमि अपक्षय/क्षरण (Land Degradation) के मुख्य कारण:
- वन विनाश और वन-भूमि पर अतिक्रमण।
- अनियंत्रित और अत्यधिक चराई।
- रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अनुचित/अत्यधिक प्रयोग।
- सिंचाई व्यवस्था का अविवेकपूर्ण प्रबंधन तथा अनुचित फसल चक्र।
- निर्धनता और जल/मृदा संरक्षण के समुचित उपायों का अभाव।
- पर्यावरण संरक्षण आंदोलन:
- अप्पिको आंदोलन (Appiko Movement): सितंबर 1983 में कर्नाटक के सिरसी जिले के सल्काणी वन में चिपको आंदोलन की तर्ज पर शुरू हुआ आंदोलन, जिसका उद्देश्य पेड़ों को बाहों में भरकर कटाई रोकना और वनों का संरक्षण करना था।
- प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB & SPCBs):
- जल एवं वायु प्रदूषण से निपटने हेतु भारत सरकार ने 1974 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की स्थापना की।
- CPCB ने प्रदूषण फैलाने वाले 17 बड़े उद्योगों की श्रेणियों की पहचान की है।
- कार्य: जल-वायु गुणवत्ता का मूल्यांकन, मानक निर्धारित करना, नदियों व कुओं की स्वच्छता सुनिश्चित करना और जन-जागरूकता फैलाना।
6. धारणीय विकास / सतत विकास (Sustainable Development)
- परिभाषा (UNCED / ब्रंटलैंड रिपोर्ट – “Our Common Future”): “धारणात्मक/धारणीय विकास वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति क्षमता से समझौता किए बिना पूरा करे”।
- मुख्य उद्देश्य: निर्धनों की बुनियादी आवश्यकताओं (रोजगार, भोजन, ऊर्जा, जल, आवास) की पूर्ति करना और पर्यावरण क्षय को न्यूनतम करते हुए जीवन के स्तर को सुरक्षित रखना।
- हरमन डेली (Herman Daly) के अनुसार धारणीय विकास की शर्तें:
- मानव जनसंख्या को पर्यावरण की धारण क्षमता के स्तर तक सीमित रखना।
- प्रौद्योगिकी प्रगति आगत-कुशल (Input-efficient) हो।
- नवीकरण-योग्य संसाधनों के निष्कर्षण की दर उनके पुनर्सृजन की दर से अधिक न हो।
- गैर-नवीकरण संसाधनों की क्षय दर नवीनीकृत प्रतिस्थापकों के निर्माण से अधिक न हो।
- प्रदूषण जनित अक्षमताओं में लगातार सुधार किया जाए।
7. धारणीय विकास की रणनीतियाँ (Strategies for Sustainable Development)
- ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों का उपयोग: तापीय (Thermal) व जल-विद्युत संयंत्रों के प्रतिकूल प्रभावों से बचने के लिए पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा का विस्तार।
- ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी (LPG) एवं गोबर गैस: जलाऊ लकड़ी व उपलों पर निर्भरता कम करके वन विनाश और वायु प्रदूषण को रोकना।
- शहरी क्षेत्रों में सीएनजी (CNG): सार्वजनिक परिवहन (जैसे दिल्ली में) में सीएनजी के अनिवार्य प्रयोग से वायु प्रदूषण में भारी कमी लाना।
- फोटोवोल्टिक सेल द्वारा सौर ऊर्जा: दूरदराज के क्षेत्रों में प्रदूषण-मुक्त बिजली आपूर्ति।
- लघु जलीय प्लांट (Mini-hydel Plants): पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक झरनों से सूक्ष्म टरबाइन चलाकर बिना पर्यावरण क्षति के स्थानीय बिजली उत्पादन।
- पारंपरिक ज्ञान और व्यवहार: स्वास्थ्य देखभाल में रासायनिक दवाओं के बजाय पारंपरिक हर्बल एवं आयुर्वेदिक प्रणालियों (भारत में लगभग 15,000 औषधीय पौधों की प्रजातियाँ) का उपयोग।
- जैविक कंपोस्ट खाद व वर्मीकंपोस्टing: मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और रासायनिक प्रदूषण को रोकने के लिए जैविक कचरे व केंचुओं से बनी खाद का प्रयोग।
- जैविक कीट-नियंत्रण: रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर नीम-आधारित कीटनाशकों का प्रयोग, मिश्रित फसल प्रणाली अपनाना तथा सांप, उल्लू, मोर व छिपकली जैसे प्राकृतिक कीट-नियंत्रक जीवों का संरक्षण करना।
📝 अर्धवार्षिक परीक्षा हेतु अति-महत्वपूर्ण प्रश्न (Exam QA)
- प्रश्न 1: पर्यावरण के चार मुख्य कार्यों का उल्लेख कीजिए।
- उत्तर: (i) संसाधनों की पूर्ति, (ii) अपशिष्टों को सोखना, (iii) जीवन का पोषण, (iv) सौंदर्य विषयक सेवाएँ प्रदान करना।
- प्रश्न 2: ‘धारण क्षमता’ और ‘अवशोषण क्षमता’ में क्या अंतर है?
- उत्तर: धारण क्षमता का अर्थ है कि संसाधनों का दोहन पुनर्सृजन की दर से कम हो। अवशोषण क्षमता का अर्थ है पर्यावरण द्वारा अपशिष्टों को सोखने की क्षमता।
- प्रश्न 3: भारत में पर्यावरण संकट के दोहरे स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
- उत्तर: भारत का पर्यावरण संकट दोतरफा है—पहला गरीबी के कारण प्राकृतिक संसाधनों का क्षय (जैसे वनों की कटाई) और दूसरा बढ़ते औद्योगिकीकरण व संपन्नता के कारण जल, वायु व मृदा प्रदूषण।
- प्रश्न 4: धारणीय विकास से आप क्या समझते हैं? हरमन डेली द्वारा सुझाई गई दो शर्तें लिखिए।
- उत्तर: वह विकास जो वर्तमान पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करते हुए भावी पीढ़ियों के हितों से समझौता न करे। शर्तें: (i) जनसंख्या को पर्यावरण की धारण क्षमता के भीतर रखना। (ii) नवीकरण संसाधनों का दोहन पुनर्सृजन की दर से अधिक न हो।