कक्षा 11 राजनीति विज्ञान अध्याय 2 भारतीय संविधान में अधिकार
1. अधिकार-पत्र (Bill of Rights) की अवधारणा एवं महत्त्व
संविधान केवल सरकार के विभिन्न अंगों की संरचना और उनके परस्पर संबंधों का ही निर्धारण नहीं करता, बल्कि वह सरकार की शक्तियों पर अंकुश लगाकर एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करता है जिसमें सभी नागरिकों को स्वतंत्रता और सुरक्षा प्राप्त होती है।
अधिकार-पत्र क्या है?
अधिकतर लोकतांत्रिक देशों में नागरिकों के अधिकारों को संविधान में सूचीबद्ध कर दिया जाता है। संविधान द्वारा प्रदान किए गए और संरक्षित अधिकारों की ऐसी सूची को अधिकार-पत्र (Bill of Rights) कहते हैं।
- अधिकार-पत्र का मुख्य कार्य: यह सरकार को नागरिकों के अधिकारों के विरुद्ध कार्य करने से रोकता है और यदि अधिकारों का उल्लंघन हो, तो उनके उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करता है।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारत में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही नेताओं ने अधिकारों का महत्त्व समझ लिया था। वर्ष 1928 में मोतीलाल नेहरू समिति ने सबसे पहले एक अधिकार-पत्र की माँग उठाई थी।
वास्तविक जीवन के उदाहरण (केस स्टडीज)
- 1982 के एशियाई खेलों के मजदूरों का मामला (शोषण के विरुद्ध अधिकार): 1982 के एशियाई खेलों के निर्माण कार्य के लिए ठेकेदारों ने देश के विभिन्न हिस्सों से गरीब मजदूरों को काम पर रखा। उनसे अत्यंत दयनीय दशाओं में काम कराया गया और सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से भी कम भुगतान किया गया। समाज वैज्ञानिकों की एक टीम ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की। न्यायालय ने माना कि तय न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी देना ‘बेगार’ या ‘बंधुआ मजदूरी’ जैसा है, जो शोषण के विरुद्ध मौलिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है। न्यायालय ने सरकार को मजदूरों को तयशुदा मजदूरी दिलाने का निर्देश दिया।
- मचल लालुंग का मामला (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार): असम के मड़ीगाँव जिले के चुचुरी गाँव के निवासी मचल लालुंग को 23 वर्ष की आयु में गिरफ्तार किया गया था। उन पर किसी को गंभीर चोट पहुँचाने का आरोप था। मुकदमे की सुनवाई के दौरान मानसिक रूप से अस्वस्थ पाए जाने पर उन्हें तेजपुर के ‘लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अस्पताल’ में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने 1967 और 1996 में जेल अधिकारियों को सूचित किया कि मचल स्वस्थ हैं और उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है, परंतु किसी ने ध्यान नहीं दिया। जुलाई 2005 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की टीम के निरीक्षण के बाद उन्हें 77 वर्ष की आयु में छोड़ा गया। उन्होंने बिना किसी मुकदमे के 54 वर्ष तक न्यायिक हिरासत में जीवन गंवाया। यह मामला दर्शाता है कि संविधान द्वारा प्रदत्त निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई का अधिकार व्यवहार में किस प्रकार बाधित हो सकता है।
- समानता के उल्लंघन के व्यावहारिक उदाहरण:
- स्वदेश कुमार और उनके मित्र का उदाहरण: स्वदेश कुमार जब अपने दलित मित्र के साथ गाँव के एक होटल में चाय पीने गए, तो दुकानदार ने स्वदेश कुमार को तो सुंदर कप में चाय दी, लेकिन उनके मित्र की जाति जानकर उन्हें कुल्हड़ में चाय दी। यह जाति आधारित भेदभाव और समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
- न्यूज एंकरों के साथ भेदभाव: एक टेलीविजन चैनल में 45 वर्ष की आयु पार कर चुकी महिला समाचार वाचिकाओं को एंकरिंग करने से रोक दिया गया, जबकि उसी आयु के पुरुष एंकरों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया। यह लिंग और आयु के आधार पर भेदभाव का उदाहरण है।
दक्षिण अफ्रीका के संविधान से तुलना
दिसंबर 1996 में लागू दक्षिण अफ्रीका का संविधान प्रजातंत्र की आधारशिला के रूप में एक अत्यंत विस्तृत अधिकार-पत्र शामिल करता है। इसमें नस्ल, लिंग, गर्भधारण, वैवाहिक स्थिति, जाति, रंग, आयु, विकलांगता, धर्म, संस्कृति और भाषा के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित किया गया है। इसमें पर्यावरण संरक्षण, आवास, स्वास्थ्य, भोजन, जल और सूचना पाने जैसे अधिकार भी शामिल हैं।
2. मौलिक अधिकार बनाम साधारण कानूनी अधिकार
भारतीय संविधान के भाग 3 में मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। मौलिक अधिकार साधारण कानूनी अधिकारों से मौलिक रूप से भिन्न होते हैं।
| तुलना का आधार | साधारण कानूनी अधिकार | मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) |
|---|---|---|
| संरक्षण एवं गारंटी | इन्हें साधारण कानूनों द्वारा सुरक्षा प्रदान की जाती है और लागू किया जाता है। | इनकी गारंटी और सुरक्षा स्वयं भारत का संविधान करता है। |
| संशोधन प्रक्रिया | संसद सामान्य कानून बनाकर इनमें परिवर्तन कर सकती है। | इनमें परिवर्तन करने के लिए संविधान में संशोधन (संवैधानिक प्रक्रिया) करना पड़ता है। |
| न्यायिक समीक्षा | सरकार का कोई भी अंग यदि इसका उल्लंघन करे तो सामान्य अदालत में मामला जाता है। | यदि सरकार का कोई भी अंग इनका उल्लंघन करता है, तो सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जाया जा सकता है। |
| सीमितता | ये कानून द्वारा नियंत्रित होते हैं। | ये निरंकुश या असीमित नहीं हैं; सरकार इन पर ‘औचित्यपूर्ण प्रतिबंध’ (Reasonable Restrictions) लगा सकती है। |
3. भारतीय संविधान में वर्णित 6 मौलिक अधिकार
भारतीय संविधान के भाग 3 में नागरिकों को 6 प्रमुख मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं:
(I) समता का अधिकार (अनुच्छेद 14 – 18)
समता का अधिकार समाज में व्याप्त असमानताओं और भेदभाव को समाप्त कर सभी नागरिकों को समान प्रतिष्ठा और अवसर प्रदान करता है।
- कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14): कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं और सभी को कानूनों का समान संरक्षण प्राप्त है।
- भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15): राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर दुकानों, होटलों, कुओं, तालाबों, स्नानघाटों और सार्वजनिक स्थानों में प्रवेश से रोक नहीं सकता।
- अवसर की समानता (अनुच्छेद 16): सार्वजनिक नियुक्तियों में सभी को समान अवसर मिलेंगे।
- विशेष प्रावधान (अनुच्छेद 16(4)): राज्य को यह अधिकार है कि वह पिछड़े हुए नागरिकों के लिए, जिनका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, पदों के आरक्षण का प्रावधान कर सकता है। इसे समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं, बल्कि वास्तविक समानता स्थापित करने का साधन माना जाता है।
- छुआछूत (अस्पृश्यता) का अंत (अनुच्छेद 17): अस्पृश्यता का आचरण एक दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।
- उपादियों का अंत (अनुच्छेद 18): सेना और शिक्षा के क्षेत्र में मिलने वाले सम्मान के अलावा राज्य द्वारा किसी भी प्रकार की सामाजिक उपाधि देने पर रोक लगाई गई है।
(II) स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 – 22)
लोकतंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- अनुच्छेद 19 के अंतर्गत 6 नागरिक स्वतंत्रताएँ:
- भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
- शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के एकत्र होने व सभा करने की स्वतंत्रता।
- संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता।
- भारत के संपूर्ण क्षेत्र में स्वच्छंद भ्रमण की स्वतंत्रता।
- भारत के किसी भी भाग में बसने और रहने की स्वतंत्रता।
- कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता।
- जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21): किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के बिना उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी व्यापक व्याख्या करते हुए इसमें आश्रय, आजीविका और मानवीय गरिमा के साथ जीने के अधिकार को भी शामिल किया है।
- अभियुक्तों और अपराधियों के अधिकार (अनुच्छेद 20 एवं 22):
- किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक सजा नहीं मिलेगी (दोहरे दंड से सुरक्षा)।
- कोई भी कानून किसी कार्य को पिछली तारीख से अपराध घोषित नहीं कर सकेगा (Ex-post facto law)।
- किसी भी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्य (गवाही) देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।
- गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर निकटतम न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
- निवारक नजरबंदी (Preventive Detention): सामान्यतः किसी व्यक्ति को अपराध करने के बाद गिरफ्तार किया जाता है, परंतु यदि सरकार को आशंका हो कि कोई व्यक्ति कानून-व्यवस्था या देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है, तो उसे अपराध करने से पहले ही गिरफ्तार किया जा सकता है। इसे निवारक नजरबंदी कहते हैं। यह अधिकतम 3 महीने तक हो सकती है; इसके बाद सलाहकार बोर्ड के समक्ष समीक्षा हेतु मामला लाया जाता है।
(III) शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 – 24)
यह अधिकार समाज के गरीब, वंचित और कमजोर वर्गों की सुरक्षा हेतु बनाया गया है।
- मानव दुर्व्यापार और बेगार पर रोक (अनुच्छेद 23): मनुष्यों को दास के रूप में खरीदने-बेचने, बेगार (बिना मजदूरी के काम) और बंधुआ मजदूरी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है।
- बाल श्रम पर रोक (अनुच्छेद 24): 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी कारखाने, खदान या अन्य जोखिम वाले कामों में नियोजित करने पर रोक लगाता है।
(IV) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 – 28)
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है जहाँ प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने की आजादी है।
- आस्था और अंतःकरण की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25): प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने, उसके अनुसार आचरण करने और धर्म का प्रचार करने का अधिकार है। (ध्यान दें: जबरन या लालच से धर्म-परिवर्तन कराने की अनुमति संविधान नहीं देता)।
- धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 26): धार्मिक संस्थाओं को स्थापित करने और चलाने का अधिकार।
- कर अदायगी की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 27): राज्य किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए कर देने हेतु बाध्य नहीं कर सकता।
- धार्मिक शिक्षा में उपस्थिति पर रोक (अनुच्छेद 28): राज्य द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
(V) सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29 – 30)
भारत की सांस्कृतिक विविधता की रक्षा के लिए यह अधिकार अल्पसंख्यकों को विशेष सुरक्षा देता है।
- अल्पसंख्यकों की भाषा और संस्कृति का संरक्षण (अनुच्छेद 29): भारत के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के समूह को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार है।
- शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार (अनुच्छेद 30): धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी रुचि की शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित करने और चलाने का अधिकार है। सरकार वित्तीय अनुदान देने में इन संस्थानों के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगी।
(VI) संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
केवल अधिकारों की सूची देना पर्याप्त नहीं है; उनके उल्लंघन होने पर रक्षा का माध्यम होना आवश्यक है।
- डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को “संविधान का हृदय और आत्मा” कहा था।
- इसके अंतर्गत यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह सीधे उच्च न्यायालय (Article 226) या सर्वोच्च न्यायालय (Article 32) की शरण में जा सकता है।
4. न्यायालय द्वारा जारी की जाने वाली 5 प्रमुख रिट (प्रादेश)
मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय विशेष आदेश जारी करते हैं, जिन्हें रिट (Writ) कहते हैं:
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): इसके द्वारा न्यायालय किसी गिरफ्तार व्यक्ति को अपने सामने प्रस्तुत करने का आदेश देता है। यदि गिरफ्तारी गैर-कानूनी या असंतोषजनक हो, तो न्यायालय उसे छोड़ने का आदेश दे सकता है।
- परमादेश (Mandamus): यह आदेश तब जारी किया जाता है जब न्यायालय को लगता है कि कोई सार्वजनिक पदाधिकारी अपने कानूनी और संवैधानिक दायित्वों का पालन नहीं कर रहा है, जिससे किसी नागरिक का अधिकार प्रभावित हो रहा हो।
- निषेध आदेश (Prohibition): जब कोई निचली अदालत (Subordinate Court) अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करके किसी मुकदमे की सुनवाई करती है, तो ऊपरी अदालतें (उच्च या सर्वोच्च न्यायालय) उसे ऐसा करने से रोकने के लिए यह आदेश जारी करती हैं।
- अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto): जब न्यायालय को लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिस पर उसका कोई कानूनी हक नहीं है, तो न्यायालय ‘अधिकार पृच्छा’ आदेश द्वारा उसे उस पद पर कार्य करने से रोक देता है।
- उत्प्रेषण रिट (Certiorari): जब कोई निचली अदालत या सरकारी अधिकारी बिना अधिकार के कोई कार्य करता है, तो न्यायालय उसके समक्ष विचाराधीन मामले को लेकर उसे ऊपर की अदालत या अधिकारी को हस्तांतरित कर देता है।
5. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC)
वर्ष 1993 में केंद्र सरकार द्वारा मानवाधिकारों की रक्षा और सजगता हेतु राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया।
- संरचना: इसमें सर्वोच्च न्यायालय का एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय का एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश तथा मानवाधिकारों के संबंध में व्यावहारिक अनुभव रखने वाले दो अन्य सदस्य होते हैं।
- कार्य:
- हिरासत में मृत्यु, हिरासत के दौरान दुर्व्यवहार, गायब होने, पुलिस की ज्यादतियों तथा महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार की शिकायतों की जाँच करना (स्वयं अपनी पहल पर या पीड़िता की याचिका पर)।
- जेलों में बंदियों की स्थिति का अध्ययन करना।
- मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देना।
- सीमाएँ: आयोग को स्वयं मुकदमा सुनने या सजा देने का अधिकार नहीं है। यह केवल सरकार या न्यायालय को अपनी जाँच के आधार पर मुकदमे चलाने या राहत देने की सिफारिश कर सकता है।
6. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व (DPSP) एवं मौलिक कर्तव्य
राज्य के नीति-निर्देशक तत्व (भाग 4)
संविधान निर्माताओं को ज्ञात था कि स्वतंत्र भारत के समक्ष सामाजिक और आर्थिक असमानता एक बड़ी चुनौती होगी। इसके समाधान के लिए उन्होंने संविधान के भाग 4 में नीति-निर्देशक तत्वों का समावेश किया।
- प्रकृति (Non-justiciable): नीति-निर्देशक तत्व “वाद-योग्य नहीं” हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि सरकार किसी निर्देश को लागू नहीं करती है, तो नागरिक इसे लागू करवाने के लिए अदालत नहीं जा सकते। इनके पीछे मुख्य शक्ति ‘नैतिक शक्ति’ और जनता का मत है।
- प्रमुख लक्ष्य एवं उद्देश्य:
- जनता का कल्याण; सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय।
- जीवन स्तर को ऊँचा उठाना तथा संसाधनों का समान वितरण।
- अंतरराष्ट्रीय शांति को बढ़ावा देना।
- नीतियों के उदाहरण: समान नागरिक संहिता (UCC), मद्यपान निषेध, घरेलू व कुटीर उद्योगों को बढ़ावा, उपयोगी पशुओं की बलि पर रोक, ग्राम पंचायतों को प्रोत्साहन, पंचायती राज व्यवस्था, न्यूनतम मजदूरी निर्धारण, और मनरेगा (MGNREGA) आदि।
नागरिकों के मौलिक कर्तव्य
वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन के द्वारा संविधान में नागरिकों के 10 मौलिक कर्तव्यों की सूची जोड़ी गई (अनुच्छेद 51क के तहत)।
- प्रमुख कर्तव्य: संविधान का पालन करना, राष्ट्रध्वज व राष्ट्रगान का आदर करना, देश की रक्षा करना, आपसी भाईचारा बढ़ाना तथा पर्यावरण की रक्षा करना।
- विशेषता: मौलिक कर्तव्य भी अदालत द्वारा सीधे लागू नहीं कराए जा सकते और कर्तव्यों का पालन न करने के आधार पर नागरिकों से उनके मौलिक अधिकार नहीं छीने जा सकते।
7. मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्वों में संबंध तथा संपत्ति का अधिकार
दोनों के बीच संबंध
मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं। मौलिक अधिकार जहाँ सरकार के कार्यों पर प्रतिबंध लगाते हैं (व्यक्तिगत स्वतंत्रता हेतु), वहीं नीति-निर्देशक तत्व सरकार को जनकल्याणकारी कार्य करने की प्रेरणा देते हैं।
टकराव एवं संपत्ति का अधिकार (Right to Property)
शुरुआत में ज़मींदारी उन्मूलन और समाज कल्याणकारी कानूनों को लागू करते समय मौलिक अधिकारों (विशेषकर संपत्ति के अधिकार) तथा नीति-निर्देशक तत्वों के बीच टकराव पैदा हुआ।
- मूल संविधान में स्थिति: संपत्ति अर्जन, स्वामित्व और संरक्षण का अधिकार एक मौलिक अधिकार था (अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31)।
- केशवानंद भारती केस (1973): सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि संपत्ति का अधिकार संविधान के “मूल ढाँचे” (Basic Structure) का अंग नहीं है और संसद संविधान संशोधन करके इसे सीमित कर सकती है।
- 44वाँ संविधान संशोधन (1978): जनता पार्टी सरकार द्वारा 44वें संशोधन के तहत संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया और संविधान के अनुच्छेद 300 (क) के अंतर्गत इसे केवल एक साधारण कानूनी अधिकार (Legal Right) बना दिया गया।
8. परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर (Exam Practice Section)
(A) अति-लघुउत्तरीय प्रश्न (1 अंक वाले)
प्रश्न 1. अधिकार-पत्र (Bill of Rights) से आप क्या समझते हैं? उत्तर: संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किए गए और संरक्षित अधिकारों की सूची को अधिकार-पत्र कहते हैं।
प्रश्न 2. भारत में सबसे पहले अधिकार-पत्र की माँग किसने और कब की थी? उत्तर: वर्ष 1928 में मोतीलाल नेहरू समिति ने अधिकार-पत्र की माँग की थी।
प्रश्न 3. डॉ. अंबेडकर ने किस अधिकार को “संविधान का हृदय और आत्मा” कहा था? उत्तर: संवैधानिक उपचारों के अधिकार (अनुच्छेद 32) को।
प्रश्न 4. संपत्ति के अधिकार को किस संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकारों से हटाया गया? उत्तर: 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा। वर्तमान में यह अनुच्छेद 300(क) के तहत कानूनी अधिकार है।
प्रश्न 5. निवारक नजरबंदी की अधिकतम अवधि कितनी हो सकती है? उत्तर: अधिकतम 3 महीने (इसके बाद सलाहकार बोर्ड द्वारा समीक्षा अनिवार्य है)।
(B) लघुउत्तरीय प्रश्न (3-4 अंक वाले)
प्रश्न 1. मौलिक अधिकारों और साधारण कानूनी अधिकारों में मुख्य अंतर स्पष्ट कीजिए। उत्तर:
- संरक्षण: मौलिक अधिकारों की सुरक्षा स्वयं संविधान करता है, जबकि साधारण अधिकारों की सुरक्षा सामान्य कानूनों द्वारा होती है।
- संशोधन: मौलिक अधिकारों में बदलाव के लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होती है, जबकि साधारण अधिकारों में संसद सामान्य प्रक्रिया से बदलाव कर सकती है।
- न्यायिक पहुँच: मौलिक अधिकार का हनन होने पर नागरिक सीधे उच्च या सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है।
प्रश्न 2. न्यायालय द्वारा जारी किए जाने वाले ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ और ‘परमादेश’ रिट में अंतर बताइए। उत्तर:
- बंदी प्रत्यक्षीकरण: यह अवैध रूप से गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने और रिहा करने का आदेश है।
- परमादेश: यह आदेश तब जारी होता है जब कोई सार्वजनिक अधिकारी अपने कानूनी या संवैधानिक कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहा हो।
प्रश्न 3. नीति-निर्देशक तत्वों को वाद-योग्य क्यों नहीं बनाया गया? उत्तर: संविधान निर्माताओं के पास स्वतंत्र भारत की शुरुआती स्थिति में पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं थे। साथ ही, वे भावी सरकारों को नीतियाँ लागू करने के लिए बाध्य नहीं करना चाहते थे। उन्होंने इसे नैतिक शक्ति और जनता के विवेक पर छोड़ना उचित समझा।
(C) निबंधात्मक प्रश्न (6 अंक वाले)
प्रश्न 1. भारतीय संविधान में वर्णित स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 19-22) की विस्तृत व्याख्या कीजिए। उत्तर (मुख्य बिंदु):
- अनुच्छेद 19 की 6 नागरिक स्वतंत्रताएँ: भाषण व अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सम्मेलन, संगठन निर्माण, भारत में भ्रमण, निवास तथा व्यापार/वृत्ति की स्वतंत्रता।
- जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21): कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना जीवन से वंचित न करना; सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आश्रय व आजीविका का अधिकार शामिल करना।
- अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण (अनुच्छेद 20): दोहरे दंड से मुक्ति, भूतलक्षी कानून से संरक्षण, आत्म-अभिशंसन से मुक्ति।
- निवारक नजरबंदी के प्रावधान: आशंका के आधार पर गिरफ्तारी, 3 माह की सीमा व मानवाधिकारों के संरक्षण की आवश्यकता।
9. क्विक रीकॉल तालिका (Quick Memory Table)
| विषय | संबंधित भाग / अनुच्छेद | मुख्य विशेषता / बिंदु |
|---|---|---|
| मौलिक अधिकार | भाग 3 (अनुच्छेद 12 – 35) | वाद-योग्य (Justiciable), 6 मौलिक अधिकार |
| नीति-निर्देशक तत्व | भाग 4 (अनुच्छेद 36 – 51) | गैर-वादयोग्य (Non-justiciable), लोक कल्याणकारी राज्य |
| मौलिक कर्तव्य | भाग 4(क), अनुच्छेद 51(क) | 42वाँ संशोधन (1976), 10 मूल कर्तव्य |
| राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग | अधिनियम 1993 | सिफारिशी निकाय (Recommendatory Body) |
| संपत्ति का अधिकार | वर्तमान में अनुच्छेद 300(क) | 44वें संशोधन (1978) द्वारा केवल कानूनी अधिकार |