रणथंभौर-जालौर के चौहान और दिल्ली सल्तनत

🛡️ स्वाभिमान, शौर्य और हठ की अमर गाथा: रणथंभौर-जालौर के चौहान और दिल्ली सल्तनत का महासंग्राम 🛡️

RPSC, RAS, REET, Patwari, Constable और राजस्थान की अन्य सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण टॉपिक! परीक्षा के लिहाज से यहाँ एक-एक लाइन स्वर्ण-अक्षर के समान कीमती है। इसे अभी सेव करें और अपने स्टडी ग्रुप्स में शेयर करें! 📚👇

राजस्थान के इतिहास में 13वीं और 14वीं शताब्दी का कालखंड अभूतपूर्व संघर्ष का गवाह रहा है। दिल्ली सल्तनत की विस्तारवादी नीति और राजस्थान के राजपूत शासकों के स्वाभिमान के बीच जो महासंग्राम हुआ, उसने भारत की राजनीतिक दिशा बदल दी। आइए इस ऐतिहासिक टकराव का गहरा विश्लेषण करते हैं:


1️⃣ रणथंभौर के चौहान और दिल्ली सल्तनत का महासंघर्ष (1301 ई.) 🏰🔥

क) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और स्थापना:

  • तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में पृथ्वीराज चौहान तृतीय की पराजय के बाद उनके पुत्र गोविन्दराज चौहान ने 1194 ई. में रणथंभौर में चौहान वंश की नींव डाली.
  • यहाँ के वीर शासक वीरनारायण ने दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश के आक्रमण को विफल किया, लेकिन बाद में धोखे से दिल्ली बुलाकर उनका वध करवा दिया गया. इसके बाद वागभट्ट ने पुनः दुर्ग पर अधिकार कर चौहान सत्ता को मजबूत किया.

ख) “हठी हम्मीर” देव चौहान (1282–1301 ई.) – शौर्य का शिखर:

  • हम्मीर देव इस राजवंश के सबसे प्रतापी और शक्तिशाली शासक हुए. उन्होंने अपने 18 वर्ष के शासनकाल में कुल 17 युद्ध लड़े, जिनमें से 16 युद्धों में विजय प्राप्त की.
  • इतिहास के मुख्य स्रोत: उनके काल की जानकारी नयनचंद्र सूरी रचित ‘हम्मीर महाकाव्य’, जोधराज कृत ‘हम्मीर रासो’, चंद्रशेखर रचित ‘हम्मीर हठ’ और अमीर खुसरो के वृत्तांतों से मिलती है.

ग) जलालुद्दीन खिलजी का असफल घेरा (1290-1292 ई.):

  • जलालुद्दीन ने रणथंभौर के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले ‘झाँइन दुर्ग’ (रणथंभौर की कुंजी) पर अधिकार कर लिया, लेकिन महीनों की घेराबंदी के बाद भी वह मुख्य दुर्ग नहीं जीत सका.
  • हताश होकर लौटते समय उसने अपनी बेइज्जती छिपाने के लिए कहा: “मैं ऐसे दस दुर्गों को भी मुसलमान के एक बाल के बराबर भी महत्व नहीं देता”.

घ) अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण और राजस्थान का प्रथम साका (1301 ई.):

  • आक्रमण के कारण: अलाउद्दीन की साम्राज्यवादी नीति के साथ-साथ सबसे बड़ा तात्कालिक कारण हम्मीर देव द्वारा सुल्तान के विद्रोही मंगोल सेनापतियों मीर मुहम्मद शाह (महमूद शाह) और केहब्रू को शरण देना था. हम्मीर का दो टूक जवाब था: “शरणागत की रक्षा करना चौहानों का परम धर्म है।”
  • सैन्य अभियान और विश्वासघात: अलाउद्दीन ने पहले उलूग खाँ और नुसरत खाँ को भेजा. इस घेराबंदी के दौरान खिलजी का प्रमुख सेनापति नुसरत खाँ पत्थर लगने से मारा गया. अंततः स्वयं अलाउद्दीन ने घेरा डाला और बल के बजाय छल का सहारा लेते हुए हम्मीर के दो सेनापतियों—रणमल और रतिपाल को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया. इन गद्दारों ने गुप्त रास्ते और खाद्य सामग्री के भंडार में अपवित्र चीजें मिलवा दीं, जिससे दुर्ग में भीषण खाद्य संकट खड़ा हो गया.
  • केसरिया, जौहर और पतन:
    • जब सोने के बदले भी अनाज का एक दाना मिलना दूभर हो गया, तब राजपूत योद्धाओं ने केसरिया बाना पहना.
    • 11 जुलाई 1301 ई. को रणथंभौर का दुर्ग सल्तनत के अधीन हो गया.
    • रानी रंगदेवी के नेतृत्व में वीरांगनाओं ने अग्नि में कूदकर जौहर किया, जो राजस्थान का पहला ऐतिहासिक साका माना जाता है.
    • हम्मीर की पुत्री देवलदे (पदमला) ने पदमला तालाब में कूदकर जल जौहर किया, जो राजस्थान इतिहास का एकमात्र जल जौहर है.
  • अमीर खुसरो का प्रसिद्ध कथन: जीत के बाद इतिहासकार अमीर खुसरो ने कहा: “आज कुफ्र का गढ़ (काफिरों का घर) इस्लाम का घर हो गया”.

2️⃣ जालौर के चौहान और दिल्ली सल्तनत का महासंघर्ष (1311 ई.) 🧭⚔️

क) जालौर शाखा की स्थापना:

  • 1181/1182 ई. में नाडौल शाखा के कीर्तिपाल चौहान (कीतू) ने जालौर को परमारों/प्रतिहारों से छीनकर इस शाखा की स्थापना की. प्रसिद्ध ख्यात लेखक नैणसी ने उन्हें “कीतू एक महान राजपूत” कहकर संबोधित किया है.
  • प्राचीन काल में जालौर का नाम ‘जाबालीपुर’ और किले का नाम ‘सुवर्णगिरि’ (सोनगढ़) था, इसी पर्वत के नाम पर यह शाखा ‘सोनगरा चौहान’ कहलाई.

ख) इल्तुतमिश का असफल प्रयास:

  • जालौर के प्रतापी राजा उदयसिंह सोनगरा (1205-1257 ई.) के समय 1228 ई. में सुल्तान इल्तुतमिश ने जालौर दुर्ग को घेरने का प्रयास किया, लेकिन वह पूरी तरह असफल रहा.

ग) कान्हड़देव चौहान (1305–1311 ई.) और अलाउद्दीन खिलजी का टकराव:

  • कान्हड़देव सोनगरा जालौर के अंतिम और महाप्रतापी शासक थे, जिनका अलाउद्दीन खिलजी से भीषण संघर्ष हुआ. इस इतिहास का सबसे सजीव वर्णन कवि पद्मनाभ रचित प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कान्हड़दे प्रबन्ध’ में मिलता है.
  • टकराव के कारण: 1298 ई. में गुजरात अभियान पर जा रही खिलजी की सेना को कान्हड़देव ने जालौर के रास्ते से गुजरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था. बाद में लौटती हुई तुर्की सेना पर राजपूतों ने हमला कर लूट का माल छीन लिया. नैणसी के अनुसार, एक अन्य कारण कान्हड़देव के पुत्र वीरमदेव और सुल्तान की पुत्री राजकुमारी फिरोजा के बीच प्रेम संबंध और वीरमदेव द्वारा तुर्क विवाह के प्रस्ताव को ठुकराना भी था.

घ) सिवाना दुर्ग का पतन (1308 ई.) – जालौर की चाबी:

  • जालौर दुर्ग पर आक्रमण करने से पहले अलाउद्दीन को ‘सिवाना दुर्ग’ को जीतना आवश्यक था, जिसे जालौर दुर्ग की कुंजी (चाबी) कहा जाता था.
  • सिवाना के रक्षक वीर सेनानी शीतलदेव (सातलदेव) चौहान थे. सुल्तान ने घेरा कड़ा किया और राजद्रोही ‘भावले’ (भायला) की मदद से दुर्ग के पेय जल स्रोत (कुंड) को अपवित्र करवा दिया. शीतलदेव अंत तक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए.
  • 2 जुलाई 1308 ई. को सिवाना का पतन हुआ, सुल्तान ने इसका नाम बदलकर ‘खैराबाद’ रखा और इसका कार्यभार कमालउद्दीन गुर्ग को सौंप दिया.

ङ) जालौर दुर्ग का पतन और साका (1311 ई.):

  • सिवाना जीतने के बाद कमालउद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में विशाल खिलजी सेना जालौर दुर्ग की ओर बढ़ी.
  • वर्षों तक चले घेरे के बाद भी जब सुल्तान को सफलता नहीं मिली, तो तुर्की सेना ने दहिया राजपूत बीका को प्रलोभन देकर अपनी तरफ मिलाया, जिसने किले का गुप्त रास्ता दुश्मनों को बता दिया.
  • दुर्ग के भीतर राजपूत रानियों ने जौहर किया और कान्हड़देव तथा उनके वीर पुत्र वीरमदेव ने अंतिम सांस तक लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की.
  • परिणाम: जालौर पर विजय पाकर अलाउद्दीन ने इसका नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ कर दिया और यहाँ एक मस्जिद का निर्माण करवाया, जिसे ‘अलाउद्दीन की जालौर मस्जिद (तोपखाना मस्जिद)’ कहा जाता है.

3️⃣ दिल्ली सल्तनत के इन आक्रमणों का राजस्थान पर स्थायी प्रभाव 📉🏛️

  1. राजनीतिक संप्रभुता का ह्रास: रणथंभौर और जालौर जैसे अजेय किलों के पतन से राजस्थान में राजपूतों की स्वतंत्रता को गहरा आघात लगा और दिल्ली सल्तनत का प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रभाव स्थापित हो गया.
  2. सैनिक ढांचे में बदलाव: अभेद्य समझे जाने वाले दुर्गों के पतन से यह सिद्ध हो गया कि केवल दुर्ग की रक्षात्मक दीवार के भरोसे युद्ध नहीं जीता जा सकता। राजपूतों को अपनी युद्ध रणनीतियों में बदलाव करने पर मजबूर होना पड़ा।
  3. शौर्य और स्वाभिमान की लोक-संस्कृति: हम्मीर देव का ‘हठ’ और कान्हड़देव का ‘स्वाभिमान’ आज भी राजस्थान की लोक-कथाओं, गीतों और नाटकों के माध्यम से जीवित हैं। हम्मीर के हठ के लिए आज भी यह उक्ति अमर है:“सिंह गमन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार।”
    “तिरिया तेल, हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार।”

🎯 परीक्षा के लिए क्विक रिवीजन वन-लाइनर्स (Quick Revision Points):

  1. रणथंभौर की स्थापना: 1194 ई., गोविन्दराज चौहान द्वारा.
  2. रणथंभौर की कुंजी किसे कहा जाता है? झाईन दुर्ग को.
  3. राजस्थान का प्रथम साका: 1301 ई., रणथंभौर (रानी रंगदेवी का जौहर).
  4. जल जौहर का एकमात्र साक्ष्य: पदमला तालाब, रणथंभौर (राजकुमारी देवलदे द्वारा).
  5. जालौर शाखा के संस्थापक: कीर्तिपाल सोनगरा (1181/82 ई.).
  6. जालौर दुर्ग की कुंजी: सिवाना दुर्ग.
  7. सिवाना दुर्ग का पतन और नया नाम: 1308 ई., नया नाम ‘खैराबाद’.
  8. जालौर का पतन और नया नाम: 1311 ई., नया नाम ‘जलालाबाद’.
  9. कान्हड़दे प्रबन्ध के रचयिता: कवि पद्मनाभ.

#RanthamboreChauhan #JaloreChauhan #HammirDevChauhan #KanhaddevChauhan #AlauddinKhilji #RajasthanHistory #RPSC #RAS2026 #REET #PatwariExam #AncientIndia #MedievalRajasthan #HistoryGK #CompetitiveExams #StudyNotes #ViralHistory #TrendingGK #MewarHistory #SiwanaFort


error: Content is protected !!