कक्षा 11 हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह’ कबीरदास
कक्षा 11 हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह’ कबीरदास का प्रसंग, शब्दार्थ, भावार्थ सहित विस्तृत व्याख्या और काव्य-सौंदर्य दिया गया है:
मूल पद
हम तौ एक एक करि जांनां। दोइ कहैं तिन्ही कों दोज़ग (दोज़ख़) जिन नाहिंन पहिचांनां।। एकै पवन एक ही पानी एकै जोति समांनां। एकै खाक गढ़े सब भांडे एकै कोहरा सांनां।। जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई। सब घटि अंतरि तूही व्यापक धरै सरूपै सोई।। माया देखि के जगत लुभांनां काहे रे नर गरबांनां। निरभै भया कछू नहिं ब्यापै कहै कबीर दिवाना।।
कवि परिचय (संक्षिप्त)
- कवि: कबीरदास (भक्तिकाल की निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि)।
- जीवन काल: जन्म सन् 1398 में वाराणसी के पास लहरतारा (उत्तर प्रदेश) में और मृत्यु सन् 1518 में मगहर में हुई।
- विशेषता: कबीर किताबी ज्ञान के स्थान पर आँखों देखे सत्य और अनुभव को प्रमुखता देते थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इन्हें ‘वाणी का डिक्टेटर’ कहा है।
प्रसंग (Context)
प्रस्तुत पद जयदेव सिंह और वासुदेव सिंह द्वारा संकलित-संपादित ‘कबीर वाङ्मय’ के खंड 2 (सबद) से लिया गया है। इस पद में कबीरदास जी ने परमात्मा को सृष्टि के कण-कण में देखा है और उसे ज्योति रूप में स्वीकार करते हुए उसकी व्याप्ति चराचर संसार में दिखाई है। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से ईश्वर की अद्वैत सत्ता (ईश्वर एक है) को स्थापित किया है तथा बाहरी आडंबरों व संसार के मायावी रूप पर चोट की है।
कठिन शब्दों के अर्थ (शब्दार्थ)
- एक एक – एक-एक करके / एक ही परमात्मा
- दोइ – दो
- तिन्ही – उनको
- दोज़ग (दोज़ख़) – नरक (फ़ारसी शब्द ‘दोज़ख़’ से)
- नाहिंन – नहीं
- पहिचांनां – पहचाना
- एकै – एक ही
- जोति – ज्योति / प्रकाश
- समांनां – व्याप्त
- खाक – मिट्टी
- भांडे – बर्तन (यहाँ मानव शरीर रूपी बर्तन)
- कोहरा – कुम्हार, कुंभकार (यहाँ सृष्टि के रचयिता ईश्वर से अर्थ है)
- सांनां – एक साथ मिलाकर गूँधना
- बाढ़ी – बढ़ई (लकड़ी का काम करने वाला)
- काष्ट – लकड़ी
- अगिनि – आग
- घटि – घड़ा या हृदय
- अंतरि – भीतर
- सरूपै – स्वरूप
- जगत – संसार
- लुभांनां – मोहित होना
- गरबांनां – गर्व करना / घमंड करना
- निरभै – निर्भय
- ब्यापै – व्याप्त होना / प्रभावित करना
- दिवाना – ईश्वर के प्रेम में लीन वैरागी
पद की विस्तृत व्याख्या (Line-by-Line Explanation)
- “हम तौ एक एक करि जांनां।”
- व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि हमने तो अपनी साधना और ज्ञान से यह भली-भांति जान लिया है कि ईश्वर एक ही है। संपूर्ण सृष्टि में केवल एक ही परम सत्ता व्याप्त है। (यहाँ ‘एक एक’ में यमक अलंकार है—पहले ‘एक’ का अर्थ परमात्मा है और दूसरे ‘एक’ का अर्थ संख्या एक है)।
- “दोइ कहैं तिन्ही कों दोज़ग (दोज़ख़) जिन नाहिंन पहिचांनां।।”
- व्याख्या: जो लोग अज्ञानवश आत्मा और परमात्मा को अलग-अलग मानते हैं और कहते हैं कि ईश्वर दो हैं, उन्होंने वास्तव में परम तत्व को नहीं पहचाना है। ऐसे अज्ञानी लोगों को नरक (दोज़ख़) की प्राप्ति होती है क्योंकि वे भेद-भाव में उलझे रहते हैं।
- “एकै पवन एक ही पानी एकै जोति समांनां।”
- व्याख्या: अपने तर्क की पुष्टि में कबीर कहते हैं कि पूरे संसार में एक ही हवा बहती है, एक ही पानी बहता है और सभी जीवों के भीतर एक ही दिव्य प्रकाश (आत्मा रूपी ज्योति) व्याप्त है। जब प्रकृति के तत्व सभी के लिए एक समान हैं, तो ईश्वर अलग कैसे हो सकता है?
- “एकै खाक गढ़े सब भांडे एकै कोहरा सांनां।।”
- व्याख्या: जिस प्रकार कुम्हार (कोहरा) एक ही प्रकार की मिट्टी (खाक) को एक साथ मिलाकर (सांनां) विभिन्न आकार के बर्तन (भांडे) बनाता है, उसी प्रकार उस ईश्वर रूपी कुम्हार ने पंचतत्व रूपी एक ही मिट्टी से हम सभी मनुष्यों (बर्तनों) की रचना की है। हमारी शक्लें या बाहरी रूप अलग हो सकते हैं, परंतु हमारा मूल तत्व एक ही है।
- “जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई।”
- व्याख्या: कबीरदास जी सुंदर उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार बढ़ई (बाढ़ी) लकड़ी (काष्ट) को तो काट सकता है, परंतु उस लकड़ी के भीतर छिपी हुई आग (अगिनि) को कोई नहीं काट सकता। ठीक उसी प्रकार, मनुष्य का शरीर तो नश्वर है और नष्ट हो जाता है, परंतु उसके भीतर निवास करने वाली आत्मा (जो परमात्मा का अंश है) अमर है, उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता।
- “सब घटि अंतरि तूही व्यापक धरै सरूपै सोई।।”
- व्याख्या: हे परमात्मा! संसार के सभी मनुष्यों के हृदय (घटि) के भीतर तू ही व्याप्त है और तूने ही समय-समय पर अलग-अलग स्वरूप (रूप) धारण कर रखे हैं।
- “माया देखि के जगत लुभांनां काहे रे नर गरबांनां।”
- व्याख्या: कबीर मनुष्यों को सचेत करते हुए कहते हैं कि हे मनुष्य! तू इस सांसारिक माया-मोह, धन-दौलत और झूठे आकर्षणों को देखकर क्यों उनके जाल में फँस जाता है? इस नश्वर और नाशवान संसार पर तू व्यर्थ में क्यों घमंड (गरबांनां) करता है?
- “निरभै भया कछू नहिं ब्यापै कहै कबीर दिवाना।।”
- व्याख्या: कबीरदास जी स्वयं को ईश्वर के प्रेम में लीन ‘दीवाना’ कहते हैं। वे कहते हैं कि जब मनुष्य माया के बंधनों से मुक्त होकर ईश्वर की शरण में चला जाता है, तब वह पूरी तरह निर्भय (निडर) हो जाता है। ऐसे निर्भय मनुष्य को संसार का कोई भी भय या कष्ट प्रभावित (व्याप्त) नहीं कर पाता।
भावार्थ एवं काव्य-सौंदर्य (Central Theme & Poetic Beauty)
- अद्वैत सत्ता का प्रतिपादन: कबीर ने बड़ी ही तार्किकता के साथ सिद्ध किया है कि ईश्वर और आत्मा एक ही हैं। उन्होंने अद्वैत सत्ता को स्थापित करने के लिए बढ़ई, लकड़ी, कुम्हार और मिट्टी के व्यावहारिक उदाहरण दिए हैं।
- भाषा शैली: कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है, जिसमें सहज प्रवाह और तीखापन है।
- अलंकार योजना:
- यमक अलंकार: ‘एक एक’ में (परमात्मा और संख्या एक) का सुंदर प्रयोग है।
- अनुप्रास अलंकार: ‘काष्ट ही काटै’, ‘काहे रे नर गरबांनां’ आदि में व्यंजनों की सुंदर आवृत्ति है।
- रूपक अलंकार: ईश्वर को कुम्हार (‘कोहरा’) और मनुष्यों को बर्तन (‘भांडे’) के रूप में दर्शाया गया है।
- उदाहरण/दृष्टांत अलंकार: बढ़ई और आग के उदाहरण के माध्यम से आत्मा की अमरता को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से समझाया गया है।
- रस: पद में शांत रस और भक्ति की प्रधानता है।