भारत का भौतिक स्वरूप / भू-आकृति (Physiography of India): विस्तृत नोट्स
1. भूवैज्ञानिक संरचना एवं इतिहास (Geological Structure and History)
भारत का भौतिक स्वरूप इसकी भूगर्भीय संरचना और विभिन्न कालों में क्रियाशील रही आंतरिक एवं बाह्य शक्तियों का परिणाम है। भारत में चट्टानों और स्थलाकृतियों की अत्यधिक विविधता पाई जाती है।
(क) हिमालय की उत्पत्ति और प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics)
- प्राचीन काल: आज से करोड़ों वर्ष पूर्व वर्तमान भारत का प्रायद्वीपीय भाग गोंडवानालैंड (Gondwanaland) का हिस्सा था, जबकि उत्तरी भाग यूरेशियन प्लेट (अंगारालैंड) का हिस्सा था। इन दोनों विशाल भूखंडों के मध्य टेथिस सागर (Tethys Sea) नामक एक भू-अभिनति (Geosyncline) स्थित थी, जिसमें दोनों ओर की नदियों द्वारा अवसाद जमा किए जा रहे थे।
- टक्कर और वलन (Collision & Folding): प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार, इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट उत्तर की ओर प्रवाहित होते हुए विशाल यूरेशियन प्लेट से टकराई। इस टक्कर के परिणामस्वरूप दोनों प्लेटों के बीच स्थित टेथिस सागर के अवसादों में तीव्र संपीड़न (Compression) हुआ, जिससे उसमें वलन (Folding) पड़ गए। इसी वलन प्रक्रिया से विश्व की सबसे नवीन वलित पर्वत श्रृंखला ‘हिमालय’ का जन्म हुआ।
- विशाल मैदान का निर्माण: हिमालय के उत्थान के कारण उसके दक्षिण में एक विशाल गर्त (Trough) बन गया था। इस गर्त में हिमालय से निकलने वाली नदियों (सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र) और प्रायद्वीपीय पठार की नदियों द्वारा लगातार अवसाद और गाद जमा की गई, जिससे अंततः उत्तर भारत के विशाल मैदान का निर्माण हुआ।
(ख) भारत के तीन मुख्य भूवैज्ञानिक खंड (Three Geological Divisions)
भूवैज्ञानिक दृष्टि से भारत को तीन प्रमुख खंडों में विभाजित किया जाता है:
- प्रायद्वीपीय खंड (Peninsular Block): यह अत्यंत प्राचीन, कठोर और भूगर्भीय रूप से स्थिर खंड है, जो मुख्य रूप से ग्रेनाइट, नीस और बेसाल्ट चट्टानों से बना है।
- हिमालय और अन्य अतिरिक्त-प्रायद्वीपीय पर्वतमालाएं: यह नवीन वलित पर्वतों का क्षेत्र है, जो भूगर्भीय रूप से अस्थिर एवं संवेदनशील है (यहाँ बार-बार भूकंप आते हैं)।
- सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान: यह एक अत्यंत नवीन जलोढ़ मैदान है जो अत्यधिक उपजाऊ है।
2. भारत के प्रमुख भौतिक प्रदेश (Physiographic Divisions of India)
NCERT और प्रामाणिक भौगोलिक वर्गीकरण के आधार पर भारत को 6 प्रमुख भौतिक प्रदेशों में विभाजित किया जाता है:
(क) उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला (The Himalayas)
हिमालय भारत की उत्तरी सीमा पर एक अभेद्य प्राकृतिक प्रहरी के रूप में स्थित है। यह पश्चिम में सिंधु नदी के मोड़ से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक लगभग 2,400 से 2,500 किलोमीटर की लंबाई में एक चाप (Arc) की आकृति में फैला हुआ है। इसकी चौड़ाई कश्मीर में लगभग 400 किमी और अरुणाचल प्रदेश में लगभग 150 किमी है।
भौगोलिक रूप से हिमालय को तीन समानांतर श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
1. बृहद हिमालय या हिमाद्रि (Great Himalayas / Himadri)
- यह हिमालय की सबसे उत्तरी, प्राचीन और सर्वोच्च श्रेणी है।
- औसत ऊंचाई: इसकी औसत ऊंचाई लगभग 6,000 मीटर है।
- प्रमुख चोटियां: विश्व की सर्वोच्च चोटियां इसी श्रेणी में स्थित हैं, जैसे—माउंट एवरेस्ट (8848.86 मीटर, नेपाल), कंचनजंगा (8586 मीटर, भारत सिक्किम), मकालू, धौलागिरी, नंगा पर्वत और नंदा देवी।
- यह श्रेणी वर्षभर हिमाच्छादित रहती है, जहाँ से गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे विशाल हिमनद निकलते हैं।
2. लघु या मध्य हिमालय (Lesser / Middle Himalayas / Himachal)
- यह बृहद हिमालय के दक्षिण में स्थित है और अत्यधिक कटी-फटी तथा संकीर्ण पर्वतीय श्रेणी है।
- ऊंचाई व श्रेणियां: इसकी ऊंचाई 3,700 से 4,500 मीटर के मध्य है। इसकी प्रमुख उप-श्रेणियों में पीर पंजाल (सबसे लंबी), धौलाधर और महाभारत श्रेणी शामिल हैं।
- स्वास्थ्यवर्धक स्थल: शिमला, मसूरी, नैनीताल, अल्मोड़ा, दार्जिलिंग जैसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल इसी श्रेणी में स्थित हैं।
- घास के मैदान: इस श्रेणी के ढलानों पर छोटे-छोटे मुलायम घास के मैदान पाए जाते हैं, जिन्हें कश्मीर में ‘मर्ग’ (जैसे—सोनमर्ग, गुलमर्ग) और उत्तराखंड में ‘बुग्याल’ या ‘पयाल’ कहा जाता है।
3. बाह्य हिमालय या शिवालिक (Outer Himalayas / Shiwalik)
- यह हिमालय की सबसे दक्षिणी और सबसे नवीन श्रेणी है, जिसका निर्माण अभी भी जारी है।
- ऊंचाई: इसकी औसत ऊंचाई 900 से 1,100 मीटर के बीच है।
- दून घाटियाँ: लघु हिमालय और शिवालिक श्रेणी के बीच पाई जाने वाली समतल संरचनात्मक घाटियों को पश्चिम में ‘दून’ और पूर्व में ‘द्वार’ कहा जाता है, जैसे—देहरादून, कोटलीदून, पाटलीदून और हरिद्द्वार।
* ट्रांस-हिमालय (Trans-Himalayas)
- यह बृहद हिमालय के उत्तर में स्थित तिब्बत का भाग है। इसमें काराकोरम, लद्दाख और जास्कर श्रेणियां शामिल हैं।
- काराकोरम श्रेणी को ‘उच्च एशिया की रीढ़’ कहा जाता है। भारत की सबसे ऊंची चोटी K2 (गॉडविन ऑस्टिन – 8611 मीटर) इसी काराकोरम श्रेणी में स्थित है (जो वर्तमान में PoK क्षेत्र में है)।
* पूर्वांचल की पहाड़ियाँ (Purvachal Hills)
- भारत के सुदूर पूर्वोत्तर राज्यों में म्यांमार की सीमा के समानांतर उत्तर से दक्षिण की ओर फैली पहाड़ियों को पूर्वांचल कहा जाता है। इसमें पटकाई बूम, नागा पहाड़ियां, मणिपुर पहाड़ियां और मिजो (लुशाई) पहाड़ियां शामिल हैं। नागा पहाड़ियों की सर्वोच्च चोटी ‘सारामाती’ है।
हिमालय का प्रादेशिक (नदी घाटियों के आधार पर) वर्गीकरण:
सिडनी बुरार्ड ने पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली नदियों के आधार पर हिमालय को चार भागों में वर्गीकृत किया है:
| प्रादेशिक नाम | सीमा निर्धारण (नदियाँ) | लंबाई | प्रमुख विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| पंजाब / कश्मीर हिमालय | सिंधु नदी से सतलुज नदी | 560 किमी | यहाँ जाफरान (केसर) की खेती के लिए प्रसिद्ध ‘करेवा’ मिट्टी पाई जाती है। |
| कुमाऊं हिमालय | सतलुज नदी से काली नदी | 320 किमी | सर्वोच्च चोटी नंदा देवी है। गंगा-यमुना का उद्गम इसी भाग में है। |
| नेपाल हिमालय | काली नदी से तीस्ता नदी | 800 किमी | यह सबसे ऊंचा भाग है; एवरेस्ट और कंचनजंगा इसी में स्थित हैं। |
| असम हिमालय | तीस्ता नदी से दिहांग (ब्रह्मपुत्र) | 720 किमी | नमचा बरवा चोटी और पूर्वोत्तर की अधिकांश जनजातीय पहाड़ियाँ। |
(ख) उत्तर भारत का विशाल मैदान (The Northern Plains)
यह मैदान हिमालय के दक्षिण और प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर में स्थित है, जिसका निर्माण सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र तथा उनकी सहायक नदियों द्वारा जमा की गई उपजाऊ जलोढ़ मृदा से हुआ है। यह लगभग 3200 किमी लंबा (भारत में 2400 किमी) और 150 से 300 किमी चौड़ा है।
भौतिक लक्षणों के आधार पर मैदान का वर्गीकरण:
उत्तर से दक्षिण के क्रम में इस मैदान को चार विशिष्ट पट्टियों में विभाजित किया जाता है:
- भाबर (Bhabar): शिवालिक के गिरिपद (Foot-hills) क्षेत्र में 8 से 16 किमी चौड़ी पट्टी, जो कंकड़-पत्थरों और गोल पत्थरों (Pebbles) के जमाव से बनी है। यहाँ नदियां धरातल के नीचे विलीन (अदृश्य) हो जाती हैं।
- तराई (Tarai): भाबर के दक्षिण में स्थित दलदली, नम और अत्यधिक सघन वनों का क्षेत्र है। यहाँ भाबर की लुप्त नदियां पुनः धरातल पर प्रकट होती हैं।
- बांघर (Bhangar): यह मैदान का वह ऊँचा भाग है जहाँ बाढ़ का पानी प्रतिवर्ष नहीं पहुँच पाता। यह पुरानी जलोढ़ मिट्टी से निर्मित है और इसमें चूनेदार कंकड़ की ग्रंथियाँ पाई जाती हैं।
- खादर (Khadar): यह बाढ़ के मैदानों का निचला भाग है जहाँ प्रतिवर्ष नदियां नई उपजाऊ मिट्टी (नवीन जलोढ़) लाकर जमा करती हैं। यह कृषि के लिए अत्यधिक उपजाऊ क्षेत्र है।
बांघर और खादर में तुलनात्मक अंतर:
| लक्षण | बांघर (Bhangar) | खादर (Khadar) |
|---|---|---|
| मिट्टी का प्रकार | पुरानी जलोढ़ मिट्टी (Older Alluvium) | नवीन जलोढ़ मिट्टी (Newer Alluvium) |
| भौगोलिक स्थिति | मैदान का उच्च भाग, जहाँ बाढ़ का पानी नहीं पहुँचता। | नदी के निकट का निचला मैदान, जो प्रतिवर्ष बाढ़ से प्रभावित होता है। |
| उर्वरता | कम उपजाऊ होती है, सघन कृषि के लिए खाद की आवश्यकता होती है। | अत्यधिक उपजाऊ और उपजाऊपन का प्राकृतिक रूप से नवीनीकरण होता है। |
| संरचना | इसमें चूनेदार कंकरों की प्रचुरता होती है। | यह महीन बलुई और गाद युक्त सघन चिकनी मिट्टी है। |
(ग) प्रायद्वीपीय पठार (The Peninsular Plateau)
यह भारत का सबसे प्राचीन, विस्तृत और स्थिर भूभाग है। इसकी आकृति एक उल्टे त्रिभुज (Triangular) के समान है, जिसका आधार उत्तर में अरावली, राजमहल की पहाड़ियों तक और शीर्ष दक्षिण में कन्याकुमारी तक फैला है। यह मुख्य रूप से गोंडवानालैंड के विखंडन से बनी क्रिस्टलीय आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है।
इसे दो मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है:
1. मध्य उच्च भूमि (Central Highlands)
- यह नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित है। इसके अंतर्गत मालवा का पठार, बुंदेलखंड, बघेलखंड और पूर्व में खनिजों से समृद्ध छोटा नागपुर का पठार आता है।
- मेघालय/शिलॉन्ग का पठार: भूगर्भीय रूप से यह प्रायद्वीपीय पठार का ही पूर्वी विस्तार है, जो राजमहल पहाड़ियों से ‘मालदा गैप’ (Malda Gap) द्वारा अलग हो गया है। यहाँ गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियाँ स्थित हैं।
2. दक्कन का पठार (Deccan Plateau)
- यह नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित एक त्रिभुजाकार पठार है। इसका निर्माण मुख्य रूप से क्रेटेशियस काल के ज्वालामुखी लावा के जमाव से हुआ है, जिसे ‘दक्कन ट्रैप’ (Deccan Trap) कहते हैं। यहाँ कपास की कृषि के लिए प्रसिद्ध काली मिट्टी (रेगुर) पाई जाती है।
पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट का तुलनात्मक अंतर:
प्रायद्वीपीय पठार के पश्चिमी और पूर्वी किनारों पर क्रमशः पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट स्थित हैं:
| लक्षण | पश्चिमी घाट (Western Ghats / Sahyadri) | पूर्वी घाट (Eastern Ghats) |
|---|---|---|
| निरंतरता | यह एक सतत (Continuous) श्रृंखला है, जिसे केवल दरों (थालघाट, भोरघाट, पालघाट) द्वारा पार किया जा सकता है। | यह अत्यधिक कटा-फटा और विच्छिन्न (Discontinuous) है क्योंकि महानदी, गोदावरी जैसी नदियों ने इसे काट दिया है। |
| औसत ऊंचाई | इसकी औसत ऊंचाई 900 से 1,600 मीटर है। | इसकी औसत ऊंचाई कम है, लगभग 600 मीटर। |
| सर्वोच्च शिखर | प्रायद्वीपीय भारत और पश्चिमी घाट का सर्वोच्च शिखर अनाईमुडी (2,695 मीटर) है। | पूर्वी घाट का सर्वोच्च शिखर महेंद्रगिरी (1,501 मीटर) या विशाखापत्तनम चोटी है। |
| वर्षा की प्रकृति | यहाँ तीव्र पर्वतीय वर्षा (Orographic Rain) होती है। | यहाँ वर्षा अपेक्षाकृत कम होती है। |
(घ) तटीय मैदान (The Coastal Plains)
प्रायद्वीपीय पठार के दोनों ओर संकीर्ण तटीय मैदानों का विस्तार पाया जाता है, जिन्हें दो भागों में विभाजित किया जाता है:
1. पश्चिमी तटीय मैदान (Western Coastal Plain)
- यह पश्चिमी घाट और अरब सागर के मध्य स्थित एक संकीर्ण मैदान है।
- उप-विभाग: गुजरात के तटीय मैदान को छोड़कर, महाराष्ट्र और गोवा के तट को कोंकण तट, कर्नाटक के तट को कन्नड़ तट तथा केरल के विस्तृत तट को मालाबार तट कहा जाता है।
- कयाल (Kayals): मालाबार तट पर विशेष लैगून पाए जाते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘कयाल’ कहते हैं, जैसे—वेम्बनाड झील। ये मछली पकड़ने और अंतर्देशीय जल परिवहन के लिए प्रसिद्ध हैं।
- पश्चिमी तटीय मैदान की नदियां तीव्र गति से बहती हैं और डेल्टा न बनाकर ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं।
2. पूर्वी तटीय मैदान (Eastern Coastal Plain)
- यह पूर्वी घाट और बंगाल की खाड़ी के मध्य स्थित अपेक्षाकृत चौड़ा और समतल मैदान है।
- उप-विभाग: इसके उत्तरी भाग को उत्कल मैदान या उत्तरी सरकार तट और दक्षिणी भाग (तमिलनाडु तट) को कोरोमंडल तट कहा जाता है।
- इस मैदान की नदियां (महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले अत्यधिक विशाल उपजाऊ डेल्टा का निर्माण करती हैं।
- उड़ीसा में स्थित चिल्का झील भारत में खारे पानी की सबसे बड़ी लैगून झील है जो इसी मैदान का हिस्सा है।
(ङ) थार का मरुस्थल (The Thar Desert)
- अरावली पहाड़ियों के उत्तर-पश्चिम में स्थित यह एक अत्यंत शुष्क और रेतीला क्षेत्र है।
- यहाँ प्रतिवर्ष 150 मिलीमीटर से भी कम वर्षा होती है, जिसके कारण यह वनस्पति विहीन और अत्यधिक शुष्क जलवायु वाला क्षेत्र है।
- यहाँ रेत के बड़े-बड़े टीले पाए जाते हैं, जिनमें अर्धचन्द्राकार आकृति वाले रेत के टीलों को ‘बरखान’ (Barchans) कहा जाता है।
- इस क्षेत्र की एकमात्र सबसे बड़ी नदी ‘लूनी नदी’ है, जो कच्छ के रन में जाकर लुप्त हो जाती है। यह एक अंतःस्थलीय अपवाह का उदाहरण है।
(च) द्वीप समूह (The Islands)
भारत के पास दो प्रमुख द्वीप समूह हैं, जिनकी भौगोलिक विशेषताएं बिल्कुल भिन्न हैं:
1. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (Andaman & Nicobar Islands)
- यह बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीपों की एक श्रृंखला है, जो वास्तव में जलमग्न पर्वतीय श्रेणियों (निमज्जित पर्वतों) के शिखर हैं।
- यहाँ भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी ‘बैरन द्वीप’ (Barren Island) स्थित है।
- अंडमान द्वीप समूह को निकोबार द्वीप समूह से ’10 डिग्री चैनल’ (10° Channel) पृथक करता है।
2. लक्षद्वीप समूह (Lakshadweep Islands)
- यह अरब सागर में केरल के मालाबार तट के समीप स्थित है।
- यह संपूर्ण द्वीप समूह छोटे-छोटे प्रवाल द्वीपों (Coral Islands / Atolls) से निर्मित है।
- इसका प्रशासनिक मुख्यालय कावारत्ती (Kavaratti) द्वीप पर स्थित है।
3. विश्वविद्यालय परीक्षा हेतु विशेष मार्गदर्शन (MDSU Exam Tips)
बी.ए. चतुर्थ सेमेस्टर के भूगोल के परीक्षार्थियों के लिए उत्तर-लेखन की विशेष रणनीतियाँ:
- भौतिक मानचित्र का अंकन: “भारत के भौतिक प्रदेशों” पर पूछे जाने वाले बड़े (निबंधात्मक) प्रश्नों के उत्तर में भारत का एक सुंदर मानचित्र बनाएं। उसमें पर्वतीय क्षेत्र, उत्तर का मैदान, प्रायद्वीपीय पठार, तटीय मैदान और मरुस्थल को अलग-अलग शेडिंग (जैसे—पहाड़ को खड़ी लाइनों से, मैदान को बिंदुओं से और पठार को त्रिभुजों से) द्वारा स्पष्ट रूप से अंकित करें।
- तुलनात्मक तालिकाओं का महत्व: परीक्षा में यदि पश्चिमी घाट बनाम पूर्वी घाट, या बांघर बनाम खादर का अंतर पूछा जाए, तो सीधे पैराग्राफ लिखने के बजाय ऊपर नोट्स में दी गई तालिकाओं के प्रारूप में उत्तर लिखें। इससे अंक प्रतिशत में अत्यधिक वृद्धि होती है।
- तकनीकी शब्दावली का सटीक प्रयोग: उत्तर लिखते समय भौगोलिक शब्दों जैसे—प्लेट विवर्तनिकी, गोंडवानालैंड, टेथिस भू-अभिनति, दून, करेवा, कयाल, न्यूमैटोफोर और बरखान का सटीक प्रयोग करें और उन्हें काले पेन से अंडरलाइन करें।