कक्षा 11 राजनीतिक सिद्धांत पाठ 3 समानता (Equality)
अध्याय नोट्स: समानता (Equality) — एक राजनीतिक आदर्श और सिद्धांत
1. समानता का अर्थ और महत्व (Meaning and Importance of Equality)
- नैतिक और राजनीतिक आदर्श: समानता सदियों से मानव समाज को प्रेरित करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली आदर्श रहा है, जो सभी धर्मों और आस्थाओं में समाहित है।
- साझी मानवता की अवधारणा: समानता का बुनियादी दावा यह है कि सभी मनुष्य अपनी जाति, रंग, लिंग, नस्ल या राष्ट्रीयता के अंतर के बावजूद एक समान मूल्य और सम्मान पाने के हकदार हैं। यही अवधारणा ‘सार्वभौमिक मानवाधिकारों’ का आधार बनती है।
- ऐतिहासिक संघर्ष: समानता की मांग को लेकर इतिहास में कई संघर्ष हुए हैं, जैसे 18वीं सदी के उत्तरार्ध में हुई फ्रांसीसी क्रांति (जिसका नारा था— “स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा”), और 20वीं सदी में एशिया तथा अफ्रीका के उपनिवेश-विरोधी स्वतंत्रता संग्राम।
2. समानता और समान अवसर (Equality and Equal Opportunity)
- समान बर्ताव का मतलब हर स्थिति में एक जैसा व्यवहार नहीं: समानता का अर्थ यह नहीं है कि सभी के साथ हर स्थिति में बिल्कुल एक समान बर्ताव किया जाए (जैसे—प्रधान सेनापति या प्रधानमंत्री को विशेष दर्जा देना समानता के विरुद्ध नहीं माना जाता जब तक उसका दुरुपयोग न हो)।
- अवसरों की समानता (Equality of Opportunity): इसका तात्पर्य यह है कि सभी मनुष्यों को अपनी प्रतिभा और कौशल को विकसित करने तथा अपने लक्ष्यों व आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए समान अधिकार और अवसर मिलने चाहिए।
- बुनियादी सुविधाओं की अनिवार्यता: समाज को असमान और अन्यायपूर्ण बनाने वाली चीज़ें बुनियादी सुविधाओं (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित आवास) की अनुपलब्धता है, न कि धन या सामाजिक दर्जे का मामूली अंतर।
3. प्राकृतिक और सामाजिक असमानता में अंतर (Natural vs. Social Inequality)
राजनीतिक सिद्धांत में दो प्रकार की असमानताओं में अंतर किया जाता है:
- प्राकृतिक असमानता (Natural Inequality): यह लोगों की विभिन्न क्षमताओं, जन्मजात प्रतिभाओं और शारीरिक बनावट के कारण होती है। पारंपरिक रूप से इसे अपरिवर्तनीय माना जाता था।
- आधुनिक दृष्टिकोण: विज्ञान और तकनीक (जैसे कंप्यूटर, कृत्रिम पैर, व्हीलचेयर) की मदद से अब शारीरिक रूप से अक्षम (विकलांग) लोगों के लिए भी समाज में प्रभावी ढंग से योगदान देना संभव हो गया है (जैसे वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग)। अतः प्राकृतिक अक्षमता को अब पूरी तरह अपरिवर्तनीय नहीं माना जाता।
- समाजजनित/सामाजिक असमानता (Social Inequality): यह समाज में अवसरों की असमानता या किसी एक समूह द्वारा दूसरे समूह के शोषण से पैदा होती है (जैसे जाति व्यवस्था, स्त्री-पुरुष भेदभाव, वर्ग भेद)। समानता के समर्थकों का मुख्य सरोकार इसी समाजजनित असमानता को समाप्त करना है।
4. समानता के तीन आयाम (Three Dimensions of Equality)
एक न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज के लिए समानता के तीन आयामों पर ध्यान देना आवश्यक है:
- (क) राजनीतिक समानता (Political Equality): इसके अंतर्गत लोकतांत्रिक समाजों में सभी सदस्यों को समान नागरिकता और समान कानूनी अधिकार (जैसे मतदान का अधिकार, अभिव्यक्ति, संगठन बनाने और धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता) प्रदान किए जाते हैं।
- (ख) सामाजिक समानता (Social Equality): केवल राजनीतिक अधिकार पर्याप्त नहीं हैं; समाज में सभी वर्गों को समान अवसर मिलने चाहिए। इसके लिए सामाजिक भेदभाव (जैसे छुआछूत, जातिगत विभाजन, महिलाओं पर प्रतिबंध) को समाप्त करना और जीवनयापन के लिए जरूरी न्यूनतम सुविधाओं (स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा) की गारंटी देना आवश्यक है।
- (ग) आर्थिक समानता (Economic Equality): इसका अर्थ समाज में अमीर और गरीब के बीच की गहरी खाई को न्यूनतम करना है। समाज में पूर्ण आर्थिक समानता भले ही संभव न हो, लेकिन संसाधनों का अत्यधिक असमान वितरण समाज को वर्गों में बांटकर हिंसा और आक्रोश को जन्म दे सकता है।
5. प्रमुख राजनीतिक विचारधाराएँ और समानता पर उनके विचार
- मार्क्सवाद (Marxism): 19वीं सदी के विचारक कार्ल मार्क्स के अनुसार, गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानता का मुख्य कारण महत्वपूर्ण आर्थिक संसाधनों (भूमि, जल, जंगल, संपत्ति) पर निजी स्वामित्व है। मार्क्सवादियों का मानना है कि समानता के लिए इन संसाधनों पर जनता का सामूहिक नियंत्रण होना चाहिए।
- उदारवाद (Liberalism): उदारवादी समाज में लाभों और संसाधनों के वितरण के लिए स्वतंत्र और खुली प्रतिस्पर्धा को सबसे न्यायपूर्ण तरीका मानते हैं। वे चाहते हैं कि राज्य केवल सभी के लिए समान अवसर और जीवन का न्यूनतम स्तर सुनिश्चित करे, ताकि लोग अपनी प्रतिभा और प्रयासों के बल पर आगे बढ़ सकें।
- समाजवाद (Socialism): यह विचारधारा मौजूदा असमानताओं को कम करने और संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे पर बल देती है। समाजवाद शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों में सरकारी नियंत्रण और नियमन का समर्थन करता है।
- डॉ. राममनोहर लोहिया का विचार: भारत के प्रमुख समाजवादी चिंतक डॉ. लोहिया ने पाँच प्रकार की असमानताओं (स्त्री-पुरुष, रंग-भेद, जातिगत, औपनिवेशिक शासन, और आर्थिक) के खिलाफ संघर्ष को ‘सप्त क्रांति’ (सात क्रांतियाँ) के रूप में प्रतिपादित किया।
- नारीवाद (Feminism): यह स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों का पक्षधर राजनीतिक सिद्धांत है। नारीवादियों के अनुसार, स्त्री-पुरुष असमानता ‘पितृसत्ता’ (पुरुष प्रधान सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक व्यवस्था) का परिणाम है। वे जीवविज्ञान से जुड़े ‘लिंग’ (Sex – जो प्राकृतिक है) और समाज द्वारा गढ़ी गई भूमिकाओं यानी ‘जेंडर’ (Gender – जो समाजजनित है) के बीच अंतर करने पर बल देते हैं।
6. समानता को बढ़ावा देने के उपाय (How to Promote Equality?)
समानता प्राप्त करने के लिए राज्य और समाज निम्नलिखित नीतियां अपनाते हैं:
- औपचारिक समानता की स्थापना (Formal Equality): विशेषाधिकारों की व्यवस्था और कानूनी भेदभाव को समाप्त करना। जैसे भारतीय संविधान धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है और छुआछूत का उन्मूलन करता है।
- विभेदक बर्ताव द्वारा समानता (Differential Treatment): कभी-कभी लोगों को समान अधिकारों का उपभोग करने में सक्षम बनाने के लिए उनके साथ अलग बर्ताव करना जरूरी होता है (जैसे विकलांगों के लिए रैंप की मांग करना, या रात में काम करने वाली महिलाओं को विशेष सुरक्षा देना)।
- सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action): ऐतिहासिक रूप से शोषित और वंचित समूहों को वर्तमान वंचनाओं से उबारने के लिए विशेष सहायता देना (जैसे छात्रवृत्ति, छात्रावास की सुविधाएं, और नौकरियों व शिक्षा में आरक्षण/कोटा की नीति)।
पाठ्यपुस्तक प्रश्नावली: प्रश्न और उनके उत्तर (Questions & Answers)
प्रश्न 1: कुछ लोगों का तर्क है कि असमानता प्राकृतिक है जबकि कुछ अन्य का कहना है कि वास्तव में समानता प्राकृतिक है और जो असमानता हम चारों ओर देखते हैं उसे समाज ने पैदा किया है। आप किस मत का समर्थन करते हैं?
उत्तर: हम इस मत का समर्थन करते हैं कि अधिकांश असमानताएँ जिन्हें हम अपने चारों ओर देखते हैं, वे समाज द्वारा निर्मित (सामाजिक असमानताएँ) हैं, न कि प्राकृतिक। इसके पक्ष में निम्नलिखित कारण हैं:
- प्राकृतिक विभिन्नता बनाम सामाजिक भेदभाव: मनुष्यों में शारीरिक क्षमता, बुद्धिमत्ता या रूचि का जन्मजात अंतर होना (जैसे—कोई अच्छा संगीतकार है, तो कोई वैज्ञानिक) प्राकृतिक विभिन्नता है। लेकिन यह विभिन्नता किसी को बुनियादी मानवाधिकारों, सम्मान, शिक्षा या स्वास्थ्य से वंचित करने का आधार नहीं हो सकती।
- सामाजिक रीति-रिवाज और व्यवस्थाएं: समाज में व्याप्त अधिकांश असमानताएं (जैसे जाति व्यवस्था, लिंग-भेद, और वर्ग विभाजन) सामाजिक व्यवस्था और रीति-रिवाजों की देन हैं। उदाहरण के लिए, महिलाओं को इतिहास में कमजोर मानकर अधिकारों से वंचित रखना, या निम्न जातियों को शारीरिक श्रम के अलावा अन्य काम करने से रोकना समाज की बनाई हुई व्यवस्था थी, न कि प्रकृति की।
- तकनीक द्वारा प्राकृतिक कमियों का समाधान: आधुनिक चिकित्सा और तकनीकी प्रगति (जैसे कंप्यूटर, कृत्रिम अंग और व्हीलचेयर) ने यह साबित कर दिया है कि प्राकृतिक विकलांगताओं को भी दूर कर इंसानों को आत्मनिर्भर और सक्षम बनाया जा सकता है। अतः प्राकृतिक अंतर को समाज में शोषण या दोयम दर्जे का व्यवहार करने का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
प्रश्न 2: एक मत है कि पूर्ण आर्थिक समानता न तो संभव है और न ही वांछनीय। एक समाज ज्यादा से ज्यादा बहुत अमीर और बहुत गरीब लोगों के बीच की खाई को कम करने का प्रयास कर सकता है।
उत्तर: हाँ, हम इस तर्क से पूर्णतः सहमत हैं कि पूर्ण आर्थिक समानता न तो व्यावहारिक रूप से संभव है और न ही समाज के लिए वांछनीय है। इसके पक्ष में मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:
- प्रतिभा और परिश्रम का अंतर: प्रत्येक व्यक्ति के काम करने की क्षमता, प्रयास, कौशल और रुचि में अंतर होता है। जो व्यक्ति अधिक कठिन परिश्रम, जोखिम या नवाचार करता है, उसे आर्थिक रूप से अधिक लाभ मिलना स्वाभाविक है। यदि सभी की आय बिल्कुल बराबर कर दी जाए, तो समाज में आगे बढ़ने की प्रेरणा, सृजनशीलता और कार्यकुशलता समाप्त हो जाएगी।
- पूर्ण आर्थिक समानता असंभव: इतिहास गवाह है कि जिन देशों (जैसे पूर्व सोवियत संघ और समाजवादी व्यवस्थाओं) ने राज्य के पूर्ण नियंत्रण के माध्यम से संपत्ति के पूर्ण समाजीकरण और पूर्ण आर्थिक समानता का प्रयास किया, वहाँ भी यह पूरी तरह लागू नहीं हो सका और अंततः व्यवस्था ढह गई।
- खाई को कम करना वांछनीय लक्ष्य है: यद्यपि पूर्ण समानता संभव नहीं है, लेकिन अमीर और गरीब के बीच की अत्यधिक गहरी खाई को कम करना समाज के लिए बेहद आवश्यक है। यदि कुछ लोगों के पास असीमित धन और सत्ता केंद्रित हो जाए, और दूसरी ओर एक बड़ा वर्ग बुनियादी ज़रूरतों (भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा) के लिए भी तरसता रहे, तो समाज में आक्रोश, वर्ग-विभाजन और हिंसा बढ़ती है। इसलिए, राज्य को सभी के लिए समान अवसर और जीवन के न्यूनतम स्तर को सुनिश्चित करने का प्रयास ज़रूर करना चाहिए।
प्रश्न 3: नीचे दी गई अवधारणा और उसके उचित उदाहरणों में मेल बैठाएँ:
| (क) सकारात्मक कार्रवाई | (1) प्रत्येक वयस्क नागरिक को मत देने का अधिकार है। |
|---|---|
| (ख) अवसर की समानता | (2) बैंक वरिष्ठ नागरिकों को ब्याज की ऊँची दर देते हैं। |
| (ग) समान अधिकार | (3) प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए। |
उत्तर (सही मेल):
- (क) सकारात्मक कार्रवाई — (2) बैंक वरिष्ठ नागरिकों को ब्याज की ऊँची दर देते हैं। (कारण: यह समाज के किसी विशेष रूप से ज़रूरतमंद या संवेदनशील वर्ग को लाभ पहुँचाने के लिए किया गया विशेष न्यायसंगत विभेदक बर्ताव है)।
- (ख) अवसर की समानता — (3) प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए। (कारण: शिक्षा सभी बच्चों को अपनी आंतरिक प्रतिभा और क्षमताओं को विकसित करने का एक समान आधार प्रदान करती है)।
- (ग) समान अधिकार — (1) प्रत्येक वयस्क नागरिक को मत देने का अधिकार है। (कारण: यह लोकतांत्रिक नागरिकता का एक समान कानूनी व राजनीतिक अधिकार है जो बिना किसी भेदभाव के सभी को प्राप्त होता है)।
प्रश्न 4: किसानों की समस्या से संबंधित एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार छोटे और सीमांत किसानों को बाजार से अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता। रिपोर्ट में सलाह दी गई कि सरकार को बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन यह प्रयास केवल लघु और सीमांत किसानों तक ही सीमित रहना चाहिए।
उत्तर: हाँ, यह सलाह समानता के सिद्धांत के बिल्कुल अनुकूल और संभव है। समानता का अर्थ केवल ‘सभी के साथ हर परिस्थिति में एक जैसा व्यवहार’ करना नहीं है, बल्कि असमान परिस्थितियों वाले लोगों के साथ समानता स्थापित करने के लिए विशेष सहायता या विभेदक बर्ताव करना भी है।
- तर्क: छोटे और सीमांत किसान आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं और उनके पास बड़े किसानों की तरह विपणन, भंडारण और मोल-तोल करने के साधन नहीं होते। वे बाजार में बड़े और अमीर किसानों के साथ बराबरी से मुकाबला नहीं कर सकते।
- समानता का सिद्धांत: समानता प्राप्त करने के लिए ‘असमान लोगों के बीच समान व्यवहार’ नहीं किया जा सकता। यदि सरकार केवल लघु और सीमांत किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने के लिए हस्तक्षेप करती है, तो यह ‘विभेदक बर्ताव द्वारा समानता’ और ‘सकारात्मक कार्रवाई’ के सिद्धांतों के तहत पूरी तरह न्यायसंगत है, क्योंकि यह कमजोर वर्ग को आर्थिक रूप से सशक्त कर उन्हें बड़े किसानों के समान स्तर पर लाने का प्रयास करता है।
प्रश्न 5: निम्नलिखित में से किसमें समानता के किस सिद्धांत का उल्लंघन होता है और क्यों?
(क) कक्षा का हर बच्चा नाटक का पाठ अपना क्रम आने पर पढ़ेगा। (ख) कनाडा सरकार ने दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति से 1960 तक यूरोप के श्वेत नागरिकों को कनाडा में आने और बसने के लिए प्रोत्साहित किया। (ग) वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से रेलवे आरक्षण की एक खिड़की खोली गई। (घ) कुछ वन क्षेत्रों को निश्चित आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
उत्तर:
- (क) कक्षा का हर बच्चा नाटक का पाठ अपना क्रम आने पर पढ़ेगा:
- विश्लेषण: इसमें समानता के किसी सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होता है।
- कारण: यह ‘समान अवसर और समान बर्ताव’ के सिद्धांत के अनुकूल है, क्योंकि कक्षा के प्रत्येक बच्चे को बिना किसी भेदभाव के नाटक पढ़ने का बराबर और निष्पक्ष मौका मिल रहा है।
- (ख) कनाडा सरकार द्वारा केवल यूरोप के श्वेत नागरिकों को बसने के लिए प्रोत्साहित करना:
- विश्लेषण: इसमें समानता के सिद्धांत का गंभीर उल्लंघन होता है।
- कारण: यह नीति ‘रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता’ के आधार पर भेदभाव करती है। यह समानता के बुनियादी आदर्श “साझी मानवता” और मानव अधिकारों का उल्लंघन करती है, जिसके अनुसार सभी मनुष्य रंग या नस्ल से परे समान मूल्य और सम्मान के हकदार हैं।
- (ग) वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से रेलवे आरक्षण की खिड़की खोलना:
- विश्लेषण: इसमें समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होता है।
- कारण: यह ‘विभेदक बर्ताव द्वारा समानता’ (Differential Treatment) के सिद्धांत के अनुकूल है। वृद्ध और शारीरिक रूप से कमजोर वरिष्ठ नागरिकों को लंबी लाइनों में खड़े होने की असुविधा से बचाना न्यायसंगत है ताकि वे भी अन्य नागरिकों की तरह रेलवे सेवाओं का समान लाभ उठा सकें।
- (घ) कुछ वन क्षेत्रों को निश्चित आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित करना:
- विश्लेषण: इसमें समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होता है।
- कारण: यह ‘सकारात्मक कार्रवाई’ और ‘कमजोर वर्गों के संरक्षण’ के सिद्धांत के अनुकूल है। आदिवासी समुदाय ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से जंगलों पर निर्भर रहे हैं और मुख्यधारा के समाज की तुलना में पिछड़े हुए हैं। उनकी अनूठी संस्कृति, आजीविका और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों की रक्षा के लिए वन क्षेत्रों को आरक्षित करना पूर्णतः न्यायोचित है।
प्रश्न 6: यहाँ महिलाओं को मताधिकार देने के पक्ष में कुछ तर्क दिए गए हैं। इनमें से कौन-से तर्क समानता के विचार से संगत हैं?
(क) स्त्रियाँ हमारी माताएँ हैं। हम अपनी माताओं को मताधिकार से वंचित करके अपमानित नहीं करेंगे। (ख) सरकार के निर्णय पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी प्रभावित करते हैं इसलिए शासकों के चुनाव में उनका भी मत होना चाहिए। (ग) महिलाओं को मताधिकार न देने से परिवारों में मतभेद पैदा हो जाएंगे। (घ) महिलाओं से मिलकर आधी दुनिया बनती है। मताधिकार से वंचित करके लंबे समय तक उन्हें दबाकर नहीं रखा जा सकता।
उत्तर: दिए गए तर्कों में से तर्क (ख) और (घ) समानता के विचार से पूर्णतः संगत (अनुकूल) हैं।
समानता से संगत तर्कों का स्पष्टीकरण:
- तर्क (ख) समानता के विचार से संगत है: यह ‘राजनीतिक समानता’ और ‘लोकतांत्रिक भागीदारी’ के सिद्धांत पर आधारित है। चूंकि सरकार द्वारा बनाए गए कानून और नीतियां पुरुषों और महिलाओं दोनों के जीवन को समान रूप से प्रभावित करती हैं, इसलिए उन्हें अपने प्रतिनिधियों को चुनने का समान अधिकार (मताधिकार) होना ही चाहिए।
- तर्क (घ) समानता के विचार से संगत है: यह ‘साझी मानवता’ और ‘समान मानव अधिकारों’ के सिद्धांत के अनुकूल है। महिलाएं समाज की आधी आबादी हैं, इसलिए उन्हें उनके बुनियादी राजनीतिक अधिकार से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं है और न ही उन्हें लंबे समय तक दबाकर रखा जा सकता है।
असंगत तर्कों का स्पष्टीकरण:
- तर्क (क) समानता के विचार से असंगत है: यह महिलाओं को एक स्वतंत्र और समान नागरिक के रूप में देखने के बजाय केवल उनकी पारंपरिक पारिवारिक भूमिका (माता) के रूप में देखता है। समानता का आदर्श महिलाओं को जन्म या पारिवारिक स्थिति के बजाय उनके स्वतंत्र अस्तित्व के आधार पर समान अधिकार देने की मांग करता है।
- तर्क (ग) समानता के विचार से असंगत है: यह मताधिकार को महिलाओं के बुनियादी अधिकार और नागरिक समानता के रूप में देखने के बजाय केवल ‘पारिवारिक शांति बनाए रखने के एक साधन’ के रूप में संकीर्ण दृष्टिकोण से देखता है।