Class 11 मीरा भक्ति और मुक्ति की आवाज़
कवयित्री परिचय (संक्षेप में)
- जन्म: सन् 1498, कुड़की गाँव (मारवाड़ रियासत)।
- प्रमुख रचनाएँ: मीरा पदावली, नरसीजी-रो-माहेरो।
- मृत्यु: सन् 1546।
- भक्ति धारा: मीरा सगुण धारा की महत्वपूर्ण भक्त कवयित्री थीं। कृष्ण की उपासिका होने के कारण उनकी कविता में सगुण भक्ति मुख्य रूप से मौजूद है, लेकिन उसमें निर्गुण भक्ति का प्रभाव भी मिलता है। संत कवि रैदास उनके गुरु माने जाते हैं। वे बचपन से ही कृष्ण को अपना आराध्य और पति मानती आ रही थीं।
मूल पद
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जा के सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई। छांड़ि दयी कुल की कानि, कहा करिहै कोई? संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक-लाज खोयी। अंसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोयी। अब त बेलि फैलि गयी, आणंद-फल होयी। दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से विलोयी। दधि मथि घृत काढ़ि लियो, डारि दयी छोयी। भगत देखि राजी हुयी, जगत देखि रोयी। दासि मीरा लाल गिरधर! तारो अब मोही।
कठिन शब्दों के अर्थ (शब्दार्थ)
- गिरधर: गिरि (पर्वत) को धारण करने वाले (श्रीकृष्ण)।
- गोपाल: गायों को पालने वाले (श्रीकृष्ण)।
- जा के: जिसके।
- सोई: वही।
- कुल की कानि: परिवार या वंश की मर्यादा।
- कहा करिहै: क्या करेगा।
- ढिग: साथ या पास।
- लोक-लाज: समाज की लोक-मर्यादा या लोक-लाज।
- अंसुवन: आँसुओं।
- सींचि-सींचि: सींच-सींचकर।
- प्रेम-बेलि: प्रेम की बेल।
- आणंद-फल: आनंद रूपी फल।
- मथनियाँ: मथनी (दही मथने की मथानी)।
- विलोयी: मथी।
- दधि: दही।
- घृत: घी (यहाँ तात्पर्य ‘सार तत्व’ या ‘परम सत्य’ से है)।
- काढ़ि लियो: निकाल लिया।
- डारि दयी: डाल दी / फेंक दी।
- छोयी: छाछ या सारहीन अंश (यहाँ तात्पर्य ‘संसार की असारता’ से है)।
- राजी हुयी: प्रसन्न हुई।
- जगत: संसार।
- तारो: उद्धार करो / पार लगाओ।
- मोही: मुझे।
संदर्भ और प्रसंग
- संदर्भ: प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-१’ में संकलित ‘मीरा के पद’ से लिया गया है। यह पद नरोत्तम दास स्वामी द्वारा संकलित-संपादित ‘मीरां मुक्तावली’ से उद्धृत है।
- प्रसंग: इस पद में मीराबाई ने श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति और समर्पण को व्यक्त किया है तथा सांसारिक व्यर्थ के कार्यों में व्यस्त लोगों के प्रति अपना दुख प्रकट किया है। उन्होंने सामाजिक और पारिवारिक सीमाओं को तोड़कर केवल श्रीकृष्ण को ही अपना सर्वस्व और पति स्वीकार किया है।
भावार्थ
इस पद का मुख्य प्रतिपाद्य श्रीकृष्ण के प्रति सर्वस्व अर्पण है। मीराबाई घोषणा करती हैं कि उनका इस संसार में श्रीकृष्ण के अलावा कोई दूसरा संबंधी नहीं है। वे कृष्ण-प्रेम के मार्ग में आने वाले सभी सांसारिक बंधनों और कुल की मान-मर्यादाओं को अस्वीकार कर देती हैं। उन्होंने अपने विरह के आँसुओं से सींचकर जिस प्रेम-बेल को बड़ा किया था, अब वह पूर्ण रूप से विकसित होकर आनंद का फल देने लगी है। वे संसार के सभी निरर्थक आडंबरों को छोड़कर भक्ति के वास्तविक सार तत्व को ग्रहण कर चुकी हैं।
विस्तृत व्याख्या
- “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जा के सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई।”
- व्याख्या: मीराबाई बड़ी ही स्पष्टता से कहती हैं कि इस पूरे संसार में केवल वे ही श्रीकृष्ण मेरे रक्षक और स्वामी हैं, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर धारण किया था और जो गायों का पालन करते हैं। उनके अलावा मेरा कोई दूसरा सगा-संबंधी या रक्षक नहीं है। उनकी पहचान स्पष्ट करते हुए वे कहती हैं कि जिसके मस्तक पर मोर-मुकुट सुशोभित है, वही मेरे वास्तविक पति हैं। उन्होंने भौतिक संसार के बंधनों को त्यागकर श्रीकृष्ण को ही अलौकिक रूप से अपना पति मान लिया है।
- “छांड़ि दयी कुल की कानि, कहा करिहै कोई? संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक-लाज खोयी।”
- व्याख्या: मीराबाई कहती हैं कि मैंने कृष्ण-प्रेम के लिए अपने राजघराने की मर्यादा (कुल की कानि) को सदा के लिए छोड़ दिया है। जब मैंने मर्यादा का त्याग कर ही दिया है, तो समाज या परिवार का कोई भी व्यक्ति अब मेरा क्या बिगाड़ सकता है? अर्थात् उन्हें किसी की आलोचना का कोई भय नहीं है। वे कहती हैं कि स्त्रियों के लिए राजघरानों में पर्दे में रहने का नियम था, परंतु मैंने इन सामाजिक और वैचारिक बंधनों को तोड़कर संतों की संगति (संतन ढिग बैठि-बैठि) को अपनाया और मंदिर में सार्वजनिक रूप से नाच-गाकर संसार की नजरों में लोक-लाज को खो दिया है।
- “अंसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोयी। अब त बेलि फैलि गयी, आणंद-फल होयी।”
- व्याख्या: मीराबाई कहती हैं कि श्रीकृष्ण के प्रति उनका यह प्रेम कोई साधारण या आसानी से मिला प्रेम नहीं है। उन्होंने इस कृष्ण-प्रेम रूपी बेल को अपने वियोग और तड़प के आँसुओं रूपी जल से लगातार सींच-सींचकर बोया है। अब समय के साथ यह साधना की प्रेम-बेल अत्यंत विस्तृत होकर फैल गई है और इस पर अब भक्ति रूपी परम आनंद के फल (आणंद-फल) लगने लगे हैं। अर्थात् अब उनकी भक्ति अपनी चरम परिपक्वता पर है जहाँ केवल आनंद की अनुभूति होती है।
- “दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से विलोयी। दधि मथि घृत काढ़ि लियो, डारि दयी छोयी।”
- व्याख्या: यहाँ मीराबाई एक सुंदर आध्यात्मिक रूपक प्रस्तुत करती हैं। वे कहती हैं कि उन्होंने कृष्ण-प्रेम रूपी दूध को अपनी भक्ति की मथानी से बड़े ही प्रेमपूर्वक मथा है। जैसे दही को मथने के बाद मूल्यवान मक्खन या घी (घृत) निकाल लिया जाता है और बचा हुआ पानी या छाछ (छोयी) को बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार उन्होंने जीवन और संसार का मंथन करके उसमें से कृष्ण-भक्ति रूपी वास्तविक अमर तत्व (घी) को प्राप्त कर लिया है और सांसारिक माया-मोह, निरर्थक आडंबरों व संबंधों रूपी छाछ (असार अंश) को त्याग दिया है।
- “भगत देखि राजी हुयी, जगत देखि रोयी। दासि मीरा लाल गिरधर! तारो अब मोही।”
- व्याख्या: मीराबाई कहती हैं कि जब वे प्रभु के सच्चे भक्तों और संतों को देखती हैं, तो उनका हृदय खुशी और संतोष से भर जाता है। लेकिन जब वे इस संसार (जगत) के लोगों को भौतिक मोह-माया, वासनाओं और निरर्थक कर्मों में फंसा हुआ देखती हैं, तो उन्हें उनकी इस अज्ञानता और दुर्दशा पर रोना आता है। अंत में वे श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती हैं कि “हे गिरधर गोपाल! मैं आपकी दासी हूँ, अब आप कृपा करके इस संसार रूपी भवसागर से मेरा उद्धार कीजिए (मुझे इस संसार से पार लगाइए)।”
काव्य-सौंदर्य और शिल्प-सौंदर्य
१. भाव पक्ष (Emotional Aspect):
- अनन्य भक्ति भाव: इस पद में मीरा की श्रीकृष्ण के प्रति दास्य और माधुर्य भाव की चरम अनन्य भक्ति दृष्टिगोचर होती है।
- रूढ़ियों और रूढ़िवादी सामाजिक मर्यादाओं पर चोट: मीराबाई ने उस युग में जहाँ रूढ़ियों से ग्रस्त समाज का बोलबाला था, वहाँ स्त्री मुक्ति की बुलंद आवाज बनकर संतों के साथ बैठने और मंदिरों में नाचने-गाने के माध्यम से सामाजिक बंधनों का कड़ा विरोध किया।
- संसार की असारता का प्रतिपादन: भौतिक संसार को केवल क्षणभंगुर ‘छाछ’ और प्रभु भक्ति को एकमात्र ‘घी’ मानकर वैराग्य की सुंदर अभिव्यक्ति की गई है।
२. कला / शिल्प पक्ष (Stylistic Aspect):
- भाषा: मीराबाई की भाषा मूलतः राजस्थानी है, जिस पर ब्रजभाषा का अत्यंत मधुर प्रभाव है। भाषा में सरलता, सहजता और सादगी इसकी सबसे बड़ी कला है।
- शैली: यह एक गेय पद है, जिसे लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत दोनों ही रूपों में गाया जा सकता है।
- अलंकार:
- रूपक अलंकार:
- ‘प्रेम-बेलि’ (प्रेम रूपी बेल)।
- ‘आणंद-फल’ (आनंद रूपी फल)।
- ‘घृत’ (भक्ति रूपी घी) और ‘छोयी’ (सांसारिक असारता रूपी छाछ) में प्रतीकात्मक रूपक है।
- पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार: ‘बैठि-बैठि’ और ‘सींचि-सींचि’ शब्दों के बार-बार प्रयोग से भाषा में विशेष प्रवाह आया है।
- अनुप्रास अलंकार: ‘गिरधर गोपाल’, ‘मोर-मुकुट’, ‘कुल की कानि’, ‘कहा करिहै’ और ‘लोक-लाज’ में वर्णों की आवृत्ति होने से अनुप्रास अलंकार की मनोहारी छटा है।
- रूपक अलंकार:
- रस: पद में भक्ति रस मुख्य रूप से और शृंगार रस (माधुर्य भाव) सहायक रूप से विद्यमान है।